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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1043, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1043

२३४ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! राजा शिखिध्वज कुम्भज मुनि के उपदेश में प्रबुद्ध हो और ऐसे वचन कहकर केवल निर्वाणपद में स्थित हुआ। जब निर्विकल्प और स्फुरण से रहित हो एक मुहूर्त्त पर्यन्त स्थित रहा—जैसे वायु से रहित दीपक स्थित होता है—तब कुम्भज ने उसे जगाकर कहा—हे राजन् ! तुम्हें समाधि में क्या है और उत्थान में क्या है तुम तो केवल आत्मा हो। मैं जानता हूँ कि तुम परमज्ञान से शोभित हुए हो। जैसे डिब्बे में रत्न होता है तो उसका प्रकाश बाहर नहीं देख पड़ता और जब डिब्बे से निकालकर देखिये तब बड़ा प्रकाश दीखता है, वैसे ही अविद्यारूपी डिब्बे से तुम निकले हो और परमज्ञान से शोभित हुए हो। हे राजन् ! अब तुममें न कोई क्षोभ है और न कोई उपाधि है। अब तुम संसार के रागद्वेष से रहित, शान्तरूप, जीवन्मुक्त होकर विचारपूर्वक विचरो तो तुम्हें कोई उपाधि न लगेगी।

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार कुम्भज मुनि ने कहा, तब राजा शान्तरूप हो गया और बोला, हे भगवन् ! जो कुछ आपने आज्ञा की है, उसे मैंने भली प्रकार जाना। पर अभी एक प्रश्न है और उसका उत्तर कृपा करके दो कि मैं दृढ़ स्थित होके रहूँ। हे भगवन् ! आत्मा तो एक है और शुद्ध और केवल आकाशरूप चैतन्यमात्र है; उसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य त्रिपुटी कहाँ से उपजी ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ स्थावर-जङ्गम संसार है, वह महाप्रलय पर्यन्त है। जब महाप्रलय होता है, तब केवल आत्मा ही शेष रहता है, जो स्वच्छ और निर्मल है। वहाँ न तेज होता है, न अन्धकार है। वह केवल अपने आप स्वभाव में स्थित होता है। जो कुछ आनन्द है, उसका अधिष्ठान आत्मा है। वह सत् और असत् से रहित है। जिसको बुद्धि 'इदं' करके कहती है, उसे सत् कहिये और जिसको नहीं कहती; उसे असत् कहिये। वह सत् असत् से रहित, सब शुभ लक्षणों से संयुक्त और अपना स्वभाव-मात्र है। उसमें कोई उपाधि नहीं। वह सर्वदा प्रकाशवान और उदय रूप है। यह संसार उस परमात्मा का चमत्कार है। जैसे रत्न का चमत्कार लाट होती है, वैसे ही ब्रह्म का चमत्कार यह संसार है। इससे

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