योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें✽ निर्वाण प्रकरण ✽ २३५
यह ब्रह्मरूप है । जो ब्रह्मा से भिन्न है, उसे मिथ्याभ्रम ही जानना । जो कुछ आकार भासते हैं, सो असत् है ।
हे राजन् ! जो सब आकार मिथ्या हैं, तो तुम्हारा संवेदन भी मिथ्या है । आत्मा में अहं त्वं का कोई उत्थान नहीं । वह केवल ज्ञानमात्र है, केवल सत् और आनन्दरूप है और अविद्यातम से रहित प्रकाशरूप है । वह प्रमाणों से नहीं जाना जाता, क्योंकि इन्द्रियों का विषय नहीं और मन की चिन्तना से रहित है, क्योंकि सबका द्रष्टा और सबका अपना आप अनुभवरूप है । हे राजन् ! तुम उसी में स्थित हो । आत्मा, बड़े से बड़ा है; सूक्ष्म से सूक्ष्म है और स्थूल से स्थूल है, जिसमें आकाश भी अणु सा है, उसमें ब्रह्माण्ड भी तृण-समान है । वह अपने आपसे पूर्ण है । उससे किंचित् भी उत्पन्न नहीं हुआ और नाना प्रकार करके स्थित हुआ है । स्फुरण से जगत् भासित होता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर केवल शुद्ध आत्मा है । राजा ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि संसार स्फुरण मात्र है और आत्मा शुद्ध शान्तिरूप और निर्विकल्प है । तो उसमें संवेदन का स्फुरण कहाँ से आया ? कुम्भज बोले, हे राजन् ! स्फुरण भी आत्मा का चमत्कार है । जैसे पवन में स्पन्दन और निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं, जब वायु चेतना है, तब चलना प्रकट होता है, और जब ठहर जाता है, तब प्रकट नहीं होता, वैसे ही संवेदन जब चेतना है, तब नाना प्रकार होते हैं और जगत् भासित होता है । और जब वह स्फुरण मिट जाता है, तब केवल शुद्ध आत्मा भासित होता है । हे राजन् ! आत्मा सत्तामात्र है और संसार भी सन्मात्र आत्मा ही है । जो सम्यकदृष्टि से देखिये तो आत्मा ही दीखता है और जो असम्यकदृष्टि से देखिये तो दुःखदायक जगत् दीखता है । जिसके मन में संसारभावना है, उसको वह दुःखदायक लगता है और जिसके हृदय में आत्मभावना होती है, उसको आत्मा ही दीखता है और संसार सुखरूप होता है; क्योंकि आत्मा अपने आपका नाम है । जिसने जगत् को अपना आप जाना है, उसको दुःख कहाँ ?
हे राजन् ! यह संसार भावनामात्र है जैसी भावना होती है, वैसा