योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
ही यह दीखता है। जिसकी भावना विष में अमृत की होती है, उसे विष भी अमृत हो जाता है और जिसकी भावना अमृत में विष की होती है, उसे अमृत भी विष हो जाता है। अतः संसार भावनामात्र है। मनुष्य जैसी भावना पक्की करता है, चाहे आगे वह वस्तु न हो तो भी उपस्थित हो जाती है अतएव संसार भावनामात्र और मिथ्या है। ज्ञानवान को दुःख कभी नहीं होता और अज्ञानी को सुख कभी नहीं होता। हे राजन् ! अहंता और संवेदन, चित्त और चैत्य, ये भी आत्मा ही की संज्ञा है। जैसे आकाश, शून्य, नभ, ये सब संज्ञा आकाश ही की हैं, वैसे ही ये सब संज्ञा आत्मा की हैं। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। 'अहं', 'त्वं' सब आत्मा के आश्रित हैं। यद्यपि भूषण सुवर्ण के आश्रित होते हैं, परन्तु सुवर्ण से भूषण तब होता है, जब अपने पूर्व-रूप को त्यागता है। आत्मा वैसा भी नहीं। वह केवल एकरस है और अपने आपमें स्थित है; कभी परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता। यह संवेदन आत्मा का चमत्कार है और आत्मा सत्-असत् से परे है। जो कुछ दृश्य है, वह आत्मा में नहीं, चित्त ने रचा है, अतएव आत्मा से परे है।
हे राजन् ! वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब दृश्य होता है ? जब आत्मा किसी का विषय नहीं, तब कारण-कार्य किसका हो ? विश्व के आदि में भी आत्मा है, अन्त में भी आत्मा है और मध्य में भी आत्मा ही है। जो कुछ और भासित होता है, वह भ्रममात्र है—जैसे आकाश में जो घर, मण्डल और पुर दीखते हैं, उनका आदि भी आकाश है, अन्त भी आकाश है और मध्य भी आकाश है और वे सब मिथ्या हैं, जैसे अग्नि नाना आकार-प्रकार में देख पड़ती है, और वे सब आकार मिथ्या हैं, एक अग्नि ही है, वैसे ही सबके आदि, मध्य और अन्त में एक आत्मा ही सार है। हे राजन् ! जल में भी देश-काल होता है, क्योंकि वह दृश्य है और इन्द्रियों का विषय है। जैसे यह तरङ्ग अमुक स्थान से उठा और अमुक स्थान में लीन हुआ, यहाँ स्थान देश हुआ और उपजकर इतने काल