योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें*** निर्वाण प्रकरण *** २३७
तक रहा, यह काल हुआ। पर जिसको इन्द्रियाँ अपना विषय न कर सकें, उसमें देश-काल कैसे हो? राजा बोले, हे भगवन्! अब मैंने भली प्रकार जान लिया है कि आत्मा चिन्मात्र है तथा ज्ञान-इन्द्रियों और कर्म-इन्द्रियों से परे है। देश, काल और इन्द्रियाँ मन से जानी जाती हैं कि अमुक देश है और अमुक काल है; पर जहाँ इन्द्रियाँ और मन ही न हो, वहाँ देश-काल कहाँ है?
कुम्भज बोले, हे राजन्! जो तुमने ऐसे जाना तो तुम जागे हो। आत्मा में देश, काल कोई नहीं। यह जीव मन और इन्द्रियों से जानता है कि यह देश है और यह काल है। जो इनसे रहित होकर देखे तो आत्मा ही दीखे और जो इन सहित देखे तो संसार ही देख पड़ेगा। हे राजन्! इनसे रहित होकर देखो, तुममें कुछ संसार न रहे कि अमुक प्रश्न किया और अब अमुक प्रश्न करूँ। संसार तब तक होता है, जब तक इनका संयोग अपने साथ होता है। हे राजन्! ब्रह्म से ब्रह्म को देखो और पूर्ण को देखो, जिसमें तुम भी पूर्ण हो। जब तुम पूर्ण होगे, तब सब ओर अपने को ही जानोगे, सब संज्ञा तुम्हारी ही होगी और उस निर्वाच्य पद को प्राप्त होगे, जहाँ इन्द्रियों की गति नहीं है। केवल आकाशरूप है। जैसे आकाश अपनी शून्यता से पूर्ण है, वैसे ही तुम भी अपने चैतन्य स्वभाव में आप पूर्ण होगे। जब तुम मनसहित षट् इन्द्रियों से रहित होकर देखोगे, तब अपने को, फिर यदि इन सहित भी देखोगे तो भी तुम्हें चैतन्य आत्मा ही भासित होगा। संसार का शब्द और अर्थ तुम्हारे हृदय से उठ जावेगा। शब्द अर्थात् संसार है, यह कहना और अर्थ अर्थात् उसकी मत् जानना। केवल आकाशरूप आत्मा ही भासित होगा। संसार संवेदन मात्र है, और संवेदन चित्तशक्ति का चमत्कार है। यही चित्त-शक्ति ब्रह्मा के रूप में स्थित हुई है और संसार को देखने लगी है। जब यह शक्ति अन्तर्मुख होती है, तब आत्मा ही देख पड़ता है, जो सदा एकरस है, और जब बहिर्मुख होती है, तब संसार देख पड़ता है। जीव जैसी भावना करता है, वैसा ही आगे दीखता है। जब