योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३८ * योगवाशिष्ठ *
संसार की भावना होती है तब संसार ही भासता है । और जब आत्मा की भावना होती है तब आत्मा ही भासता है । आत्मा सदा एकरस और असंसारी है, इससे हे राजन् ! तुम आत्मा की भावना करो कि तुम्हें आत्मा ही भासित हो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षट्सप्ततितमसर्गः ॥ ७६ ॥
कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह संसार जो तुम्हें भासित होता है, सो आत्मा में नहीं है । केवल शुद्ध आत्मा में जो अहं उत्थान है वही संसार है । पर अहं का वह चमत्कार न सत् है, न असत्, न भीतर है, न बाहर; न शून्य है, न अशून्य; केवल अपने आपमें स्थित है । संसार का प्रध्वंसाभाव भी नहीं होता, अर्थात् पहले हो और पीछे नाश हो जावे, ऐसा नहीं होता । आत्मा में संसार उदय-अस्त नहीं होता; केवल अपने आपमें स्थित है, उसमें भिन्न नहीं है । किन्तु आत्मा को यह भी नहीं कह सकते कि केवल अपने आपमें स्वाभाविक स्थित है; उनमें वाणी की गति नहीं है । वाणी उसको कहती है, जहाँ दृगग होता है, पर जहाँ दृगग न हो, वहाँ वाणी क्या कहे । यह कहना भी तुम्हारे उपदेश के निमित्त है; आत्मा में किसी शब्द की प्रवृत्ति नहीं । हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? आत्मा तो शुद्ध, निर्विकार और प्रमाणों से रहित है । जो किसी लक्षण में प्रमाण नहीं किया जाता सो आकार होकर स्थित हुआ है और शान्तरूप है ।
हे राजन् ! ऐसा आत्मा किसका कारण-कार्य हो ? कारण-कार्य तब होता है, जब प्रथम कारण परिणाम और क्षोभ को प्राप्त होता है, पर आत्मा तो शान्तरूप है । और कारण तब हो जब क्रिया से कार्य को उत्पन्न करे । पर आत्मा तो अक्रिय अर्थात् क्रिया से रहित है । कारण को कार्य से जाना जाता है, पर आत्मा चिह्न से रहित है और प्रमाणों का विषय नहीं ? इससे आत्मा किसी का कारण-कार्य नहीं है । आत्मा को कारण-कार्य मानने में मुझे आश्चर्य होता है । हे राजन् ! जो वस्तु उपजती है, वह नष्ट भी होती है, और जो नष्ट होती है वह