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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1048, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1048

निर्वाण प्रकरण२३६

उपजती भी है। पर आत्मा सबका आदि, अजन्मा और निर्विकार है। उसमें तुम स्थित हो जिससे तुम्हारा संसार निवृत्त हो जावे। यह संसार अज्ञान से भासित होता है। जब तुम स्वरूप में स्थित होकर देखोगे तब न भासित होगा; और ऐसे भी न भासित होगा कि आगे था, अब निवृत्त हुआ है। तब तो एकरस आत्मा ही दीखेगा और जीव केवल शून्य आकाश हो जावेगा। संसार से रहित होने को शून्य कहते हैं। चैतन्यस्वरूप नाना होकर भी वही है, और एक भी वही है, शून्य और शून्य से रहित भी वही है; द्वैतरूप भी वही है और अद्वैतरूप भी वही है; ऐसा भासित होगा ।

इति श्रीयो० नि० शिखिध्वजप्रथमप्रबोधननाम सप्तसप्ततितमम्मर्गः ॥ ७७ ॥

कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुम देखते हो, सो सब चैतन्य घन है। उसमें 'अहं', 'त्वं' शब्द कोई नहीं। 'अहं', 'त्वं' शब्द प्रमाद से होते हैं। जब आत्मा में स्थित होकर देखोगे तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखेगा। फिर 'अहं', 'त्वं' शब्द कहाँ भासित हों ? हे राजन् ! ये नाना प्रकार की संज्ञाएँ चित्त की कल्पना हैं। जब चित्त से रहित होगे, तब 'नाना' और 'एक', कोई संज्ञा न रहेगी। हे राजन् ! 'सब ब्रह्म' (सर्व खल्विद ब्रह्म) है, यह वाक्य वेद का सार है। जब इस वाक्य में दृढ़ भावना बुद्धि होगी, तब एकरस आत्मा ही दृष्टिगोचर होगा और चित्त नष्ट हो जावेगा। जब चित्त नष्ट हुआ, तब केवल महाशुद्ध आकाश की नाईं स्थित होकर निर्दुःख पद को प्राप्त होगे, जो आदि पद और सर्वदा मुक्तिरूप है। राजा बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि चित्त के नष्ट होने से कोई दुःख न रहेगा और चित्त के नष्ट होने का उपाय भी आपने कहा। परन्तु मैं भली भाँति नहीं समझा। मेरे दृढ़ होने के निमित्त कृपा करके फिर कहिये कि चित्त कैसे नष्ट होता है। कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह चित्त न किसी काल का है, न किसी को है, और न यह देखता है। चित्त है ही नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ और जो चित्त तुमको दृष्ट आता है तो तू आत्मा ही जान, आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं।