योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४० ✹ योगवाशिष्ठ ✹
हे राजन् ! महासर्ग के आदि और अन्त में कोई सृष्टि नहीं, केवल आत्मा है, और आत्मा में कुछ नहीं कह सकते । मैंने तुम्हारे जानने के निमित्त ऐसा कहा है । मध्य में जो कुछ दृष्टिगत होता है, वह अज्ञानी की दृष्टि है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं । आत्मा किसी का उपादानकारण या निमित्तकारण भी नहीं है; क्योंकि वह अच्युत है--परिणाम को नहीं प्राप्त होता । उपादान भी परिणाम में होता है । आत्मा शुद्ध, निराकार, आकाशरूप है । तब वह कारण-कार्य किसका हो ? चित्त भी वासनारूप है और वासना तब होती है, जब कोई वस्तु होती है । जब आगे सृष्टि नहीं, तब वासना किसकी जगे और चित्त में संसार की स्थिति कैसे हो ? इससे चित्त कुछ नहीं । यह विश्व आत्मा का चमत्कार है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है । वह केवल निरालम्ब अपने आपमें स्थित है । हे राजन् ! संसार भी नहीं हुआ और चित्त भी नहीं हुआ, तब 'अहं' आदिक शब्द भी आत्मा में नहीं हो सकते । ये शब्द तब होते हैं, जब चित्त होता है, और चित्त तब तक है, जब तक वासना है । जब निर्वासनिक पद को प्राप्त हुआ तब कोई कल्पना नहीं रहती ।
हे राजन् ! यह संसार महाप्रलय में नष्ट हो जावेगा और मत्-अमत् संसार कुछ न रहेगा । एक आत्मा ही शेष रहेगा, जो निराकार और शुद्ध है । जब तक महाप्रलय नहीं होता, तब तक संसार है । महाप्रलय क्या है, यह भी सुनो । एक क्षण आत्मा का साक्षात्कार होने से सृष्टि का शेष भी न रहेगा । ज्ञान ही महाप्रलय (अत्यन्त प्रलय) है, और अब जो देख पड़ता है, सो मिथ्या है । यह क्रिया भी मिथ्या है और इसका भान होना भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न की क्रिया भी मिथ्या है और उसका भान होना भी मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत संसार स्वप्नमात्र है, और कारण बिना ही भासित होता है । जो कारण बिना है, वह मिथ्या है । इसका कारण अज्ञान अर्थात् अपना रूप न जानना ही है । जब अपने रूप को जाना, तब अपना रूप आप ही भासित होगा । जैसे स्वप्न में अज्ञान से भिन्न आकार भासित होते हैं, पर जब ज्ञान से