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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1050, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1050

# ❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४१

जीव जागता है, तब अपना रूप आपही जानता है कि मैं ही था । हे राजन् ! मुझे तो एक आत्मा ही देख पड़ता है, आत्मा से भिन्न संसार नहीं भासित होता । इस संसार की स्थिति मानना मूर्खता है । यह सदा अचलरूप है । वेद, शास्त्र और लोक भी कहता है कि संसार मिथ्या है और मनुष्य आप भी जानता है कि यह नष्ट होता देख पड़ता है । तो फिर उसमें आस्था करना मूर्खता है । आत्मा में संसार नाना विध या एक रूप कुछ नहीं है । आत्मा सर्वदा अपने आपमें स्थित, शुद्ध और अच्युत (ज्यों-का-त्यों) है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वजबोधनं नामाष्टसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७८ ॥

शिखरध्वज बोले, हे भगवन् ! अब मेरा मोह नष्ट हुआ और अपना रूप मैंने जाना । तुम्हारी कृपा से मेरा संसारभ्रम निवृत्त हुआ, और शोकसमुद्र को तरकर अब मैं शान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ । 'अहं', 'त्वं' शब्द मुझमें कोई नहीं । अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हुआ हूँ । मैं अच्युत, चिन्मात्र, केवल और शून्य हूँ । कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा शुद्ध और आकाश की नाईं निर्मल है; बल्कि आकाश से भी अति निर्मल है । पर उसमें अहं-मल अहंमोह से उपजा है, और मोह अविचार का नाम है । जब विचार होता है, तब कोई अहं नहीं पाया जाता । यह विश्व संवेदन में है और संवेदन सबका आदि है । जब संवेदन अन्तर्मुख होता है, तब सब विश्व लीन हो जाता है । संवेदन ही में बन्धन और मुक्ति है । जब संवेदन बहिर्मुख होता है, तब बन्धन और जब अन्तर्मुख होता है, तब मोक्ष होता है । जिसने मन और इन्द्रियों से रहित होकर अपना रूप आप देखा है; उसको ज्यों का त्यों यथार्थ देख पड़ता है—और जो मोहसंयुक्त देखता है, उसको विपर्यय भासित होता है । जैसे सम्यक् दृष्टि से भूषण में सुवर्ण भासित होता है और जब भूषण के आकार मिट जाते हैं, तब भी सुवर्ण ही दीखता है । पर मूर्ख को सोने में भूषण दीखते हैं । चिरकाल के अभ्यास से जो बुद्धि इनमें जगती है, तो भी प्रारब्ध का वेग जब तक रहता है, तब तक चेष्टा होती