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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

निर्वाण प्रकरण२३६

उपजती भी है। पर आत्मा सबका आदि, अजन्मा और निर्विकार है। उसमें तुम स्थित हो जिससे तुम्हारा संसार निवृत्त हो जावे। यह संसार अज्ञान से भासित होता है। जब तुम स्वरूप में स्थित होकर देखोगे तब न भासित होगा; और ऐसे भी न भासित होगा कि आगे था, अब निवृत्त हुआ है। तब तो एकरस आत्मा ही दीखेगा और जीव केवल शून्य आकाश हो जावेगा। संसार से रहित होने को शून्य कहते हैं। चैतन्यस्वरूप नाना होकर भी वही है, और एक भी वही है, शून्य और शून्य से रहित भी वही है; द्वैतरूप भी वही है और अद्वैतरूप भी वही है; ऐसा भासित होगा ।

इति श्रीयो० नि० शिखिध्वजप्रथमप्रबोधननाम सप्तसप्ततितमम्मर्गः ॥ ७७ ॥

कुम्भज बोले, हे राजन् ! जो कुछ तुम देखते हो, सो सब चैतन्य घन है। उसमें 'अहं', 'त्वं' शब्द कोई नहीं। 'अहं', 'त्वं' शब्द प्रमाद से होते हैं। जब आत्मा में स्थित होकर देखोगे तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखेगा। फिर 'अहं', 'त्वं' शब्द कहाँ भासित हों ? हे राजन् ! ये नाना प्रकार की संज्ञाएँ चित्त की कल्पना हैं। जब चित्त से रहित होगे, तब 'नाना' और 'एक', कोई संज्ञा न रहेगी। हे राजन् ! 'सब ब्रह्म' (सर्व खल्विद ब्रह्म) है, यह वाक्य वेद का सार है। जब इस वाक्य में दृढ़ भावना बुद्धि होगी, तब एकरस आत्मा ही दृष्टिगोचर होगा और चित्त नष्ट हो जावेगा। जब चित्त नष्ट हुआ, तब केवल महाशुद्ध आकाश की नाईं स्थित होकर निर्दुःख पद को प्राप्त होगे, जो आदि पद और सर्वदा मुक्तिरूप है। राजा बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि चित्त के नष्ट होने से कोई दुःख न रहेगा और चित्त के नष्ट होने का उपाय भी आपने कहा। परन्तु मैं भली भाँति नहीं समझा। मेरे दृढ़ होने के निमित्त कृपा करके फिर कहिये कि चित्त कैसे नष्ट होता है। कुम्भज बोले, हे राजन् ! यह चित्त न किसी काल का है, न किसी को है, और न यह देखता है। चित्त है ही नहीं तो मैं तुमसे क्या कहूँ और जो चित्त तुमको दृष्ट आता है तो तू आत्मा ही जान, आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं।

२४० ✹ योगवाशिष्ठ ✹

हे राजन् ! महासर्ग के आदि और अन्त में कोई सृष्टि नहीं, केवल आत्मा है, और आत्मा में कुछ नहीं कह सकते । मैंने तुम्हारे जानने के निमित्त ऐसा कहा है । मध्य में जो कुछ दृष्टिगत होता है, वह अज्ञानी की दृष्टि है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं । आत्मा किसी का उपादानकारण या निमित्तकारण भी नहीं है; क्योंकि वह अच्युत है--परिणाम को नहीं प्राप्त होता । उपादान भी परिणाम में होता है । आत्मा शुद्ध, निराकार, आकाशरूप है । तब वह कारण-कार्य किसका हो ? चित्त भी वासनारूप है और वासना तब होती है, जब कोई वस्तु होती है । जब आगे सृष्टि नहीं, तब वासना किसकी जगे और चित्त में संसार की स्थिति कैसे हो ? इससे चित्त कुछ नहीं । यह विश्व आत्मा का चमत्कार है । आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है । वह केवल निरालम्ब अपने आपमें स्थित है । हे राजन् ! संसार भी नहीं हुआ और चित्त भी नहीं हुआ, तब 'अहं' आदिक शब्द भी आत्मा में नहीं हो सकते । ये शब्द तब होते हैं, जब चित्त होता है, और चित्त तब तक है, जब तक वासना है । जब निर्वासनिक पद को प्राप्त हुआ तब कोई कल्पना नहीं रहती ।

हे राजन् ! यह संसार महाप्रलय में नष्ट हो जावेगा और मत्-अमत् संसार कुछ न रहेगा । एक आत्मा ही शेष रहेगा, जो निराकार और शुद्ध है । जब तक महाप्रलय नहीं होता, तब तक संसार है । महाप्रलय क्या है, यह भी सुनो । एक क्षण आत्मा का साक्षात्कार होने से सृष्टि का शेष भी न रहेगा । ज्ञान ही महाप्रलय (अत्यन्त प्रलय) है, और अब जो देख पड़ता है, सो मिथ्या है । यह क्रिया भी मिथ्या है और इसका भान होना भी मिथ्या है । जैसे स्वप्न की क्रिया भी मिथ्या है और उसका भान होना भी मिथ्या है, वैसे ही जाग्रत संसार स्वप्नमात्र है, और कारण बिना ही भासित होता है । जो कारण बिना है, वह मिथ्या है । इसका कारण अज्ञान अर्थात् अपना रूप न जानना ही है । जब अपने रूप को जाना, तब अपना रूप आप ही भासित होगा । जैसे स्वप्न में अज्ञान से भिन्न आकार भासित होते हैं, पर जब ज्ञान से

# ❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४१

जीव जागता है, तब अपना रूप आपही जानता है कि मैं ही था । हे राजन् ! मुझे तो एक आत्मा ही देख पड़ता है, आत्मा से भिन्न संसार नहीं भासित होता । इस संसार की स्थिति मानना मूर्खता है । यह सदा अचलरूप है । वेद, शास्त्र और लोक भी कहता है कि संसार मिथ्या है और मनुष्य आप भी जानता है कि यह नष्ट होता देख पड़ता है । तो फिर उसमें आस्था करना मूर्खता है । आत्मा में संसार नाना विध या एक रूप कुछ नहीं है । आत्मा सर्वदा अपने आपमें स्थित, शुद्ध और अच्युत (ज्यों-का-त्यों) है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वजबोधनं नामाष्टसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७८ ॥

शिखरध्वज बोले, हे भगवन् ! अब मेरा मोह नष्ट हुआ और अपना रूप मैंने जाना । तुम्हारी कृपा से मेरा संसारभ्रम निवृत्त हुआ, और शोकसमुद्र को तरकर अब मैं शान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ । 'अहं', 'त्वं' शब्द मुझमें कोई नहीं । अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हुआ हूँ । मैं अच्युत, चिन्मात्र, केवल और शून्य हूँ । कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा शुद्ध और आकाश की नाईं निर्मल है; बल्कि आकाश से भी अति निर्मल है । पर उसमें अहं-मल अहंमोह से उपजा है, और मोह अविचार का नाम है । जब विचार होता है, तब कोई अहं नहीं पाया जाता । यह विश्व संवेदन में है और संवेदन सबका आदि है । जब संवेदन अन्तर्मुख होता है, तब सब विश्व लीन हो जाता है । संवेदन ही में बन्धन और मुक्ति है । जब संवेदन बहिर्मुख होता है, तब बन्धन और जब अन्तर्मुख होता है, तब मोक्ष होता है । जिसने मन और इन्द्रियों से रहित होकर अपना रूप आप देखा है; उसको ज्यों का त्यों यथार्थ देख पड़ता है—और जो मोहसंयुक्त देखता है, उसको विपर्यय भासित होता है । जैसे सम्यक् दृष्टि से भूषण में सुवर्ण भासित होता है और जब भूषण के आकार मिट जाते हैं, तब भी सुवर्ण ही दीखता है । पर मूर्ख को सोने में भूषण दीखते हैं । चिरकाल के अभ्यास से जो बुद्धि इनमें जगती है, तो भी प्रारब्ध का वेग जब तक रहता है, तब तक चेष्टा होती

२४२ ✼ योगवाशिष्ठ ✼

है। तब चेष्टा में भी आत्मा ही देखता है-इनमें केवल आत्मा ही का किञ्चन होता है। जैसे सोने में सुवर्ण, आकाश में नीलापन और वायु में स्पन्दन है, वैसे ही आत्मा में सृष्टि है। जैसे आकाश में नीलिमा देखने भर को है, वास्तव में कुछ नहीं; वैसे ही आत्मा में सृष्टि वास्तव में कुछ नहीं, भ्रान्तिमात्र है। जब भ्रान्ति निवृत्त होती है, तब जगत् का 'शब्द' और 'अर्थ' सब ओर से शान्त हो जाता है। शब्द-अर्थ की भावना से जो चेष्टा होती है, उससे जब अभिलाषा निवृत्त हो जाती है, तब कोई दुःख नहीं होता। इसी को मुनीश्वर निर्वाण कहते हैं। तब निर्वाणपद का ऐसा निश्चय होता है, तब जीव शान्तरूप शून्यपद में स्थित होता है।

हे राजन् ! अहं का उत्थान होना ही बन्धन है और अहं का निर्वाण होना ही मुक्ति है। अहं के होने से संसार का दुःख है। जब तक अहं का उत्थान है, तब तक संसार है, और जब तक संसार है, तब तक अहं का उत्थान है। जब संसार की सत्ता जाती रहेगी, तब अहं का स्फुरना भी निवृत्त हो जावेगा, और जब जगना नष्ट हुआ, तब अहं भी नष्ट हो जावेगा। जब अहं नष्ट हुआ, तब केवल शुद्ध आत्मा ही शेष रहेगा और उसी का भान होगा। तब असंवैद्य का उत्थान भी शान्त हो जावेगा, और चैतन्यमात्र ही रहेगा। हे राजन् ! जिसको सर्व-ब्रह्म की बुद्धि हुई है, उसको संसार की बुद्धि नहीं रहती, और जिसको संसारबुद्धि है, उसको ब्रह्मबुद्धि नहीं होती। भावना जैसी-जैसी पक्की होती है, वैसा ही वैसा आगे भासित होता है। जिसको ब्रह्मभावना दृढ़ होती है, वह ब्रह्मरूप हो जाता है और जिसको जगत् की भावना दृढ़ होती है, उसको जगत् ही भासित होता है। हे राजन् ! तुम अब जागे हो और ब्रह्मस्वरूप हुए हो, जो शुद्ध, निर्मल और प्रत्यक् है, शब्द और लक्षणों का विषय नहीं, और इन्द्रियों का विषय भी नहीं।

हे राजन् ! ऐसा आत्मा, जो केवल अद्वैत है और विश्व जिसका चमत्कार है, वह कारण-कार्य किसका हो ? जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग पवन से उपजते हैं, तो भी वे समुद्र से भिन्न नहीं होते, वैसे ही

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २४३

आत्मा में नाना प्रकार का विश्व संवेदन जगने से उपजता है, तौ भी आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है—स्फुरणमात्र है। जैसे खम्भे में मनोराज से कोई पुरुष पुतलियों की कल्पना करता है और नाना प्रकार की चेष्टाएँ करता है, पर उसकी चेष्टा तमीं तक है, जब तक संकल्प है, और जब संकल्प निवृत्त हुआ, तब शून्य खम्भा ही रह जाता है, जैसा आगे था; क्योंकि शिल्पी के संवेदन में सृष्टि थी, वैसे ही यह संसार संकल्पमात्र है। जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब संसार की सत्ता जाती रहती है। हे राजन् ! संसारसत्ता इस कारण जाती रहती है कि वह पहले ही असत है। जो वस्तु सत् होती है, उसका कभी नाश नहीं होता। इससे संसार केवल संवेदन की कल्पना है। जैसे एक शिला में पुरुष पुतलियाँ बनाता है तौ शिला में तौ पुतली कोई नहीं, ज्यों का त्यों शिला ही है, वैसे ही चित्त के जगने से आकार दीखते हैं। जब चित्त चेतने से रहित होगा, तब आत्मा को अपना रूप आप जानोगे और अशब्दपद को प्राप्त होगे, जो शान्तपद शुद्ध आकाशरूप है। हे राजन् ! सब 'शब्द' और 'अर्थ' का अभावना करना ही ब्रह्मज्ञान है। वहाँ कोई कल्पना नहीं। जब सम्यक्‌दृष्टि होती है, तब शेष सब आत्मा ही भासित होता है और यह भावना भी उठ जाती है कि यह संसार है और यह ब्रह्म है। तब केवल ज्ञेयमात्र ही रहता है, अर्थात् शिला की तरह जीव अटल-निश्चय होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजप्रबोधवर्णनं नाम एकानाशीतितमसर्गः ॥ ७६ ॥

राजा बोले, हे भगवन् ! आपका यह कहना सत्य है और मैं भी ऐसा ही जानता हूँ कि संसार आत्मा का कार्य है और आत्मा इसका कारण है। जो आत्मा का कार्य हुआ तो आत्मस्वरूप हुआ, आत्मा से भिन्न नहीं। कुम्भज बोले, हे राजन् ! आत्मा चैतन्यमात्र है, किसी का कारण-कार्य नहीं। आत्मा अप्रत्यक्ष, अक्रिय, अच्युत और नीरस है। तब जो अशब्दपद है, वह कारण-कार्य किसका हो ? कारण को कार्य द्वारा जाना जाता है, पर आत्मा किसी प्रमाण का विषय नहीं,

२४४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

अप्रत्यक्ष और अरूप है। कारण तब होता है, जब क्रिया होती है। पर वह न किसी का कारण-कार्य है और न कर्म। केवल ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है और चैतन्यमात्र शिवरूप शुद्ध है। यह विश्व भी चैतन्यमात्र है, जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही आत्मा में विश्व आत्मरूप स्थित है। ऐसा विश्व चैतन्यमात्र है, पर उसमें असम्यग्दर्शी अज्ञान से नाना प्रकार की कल्पना करता है। वस्तु जो परमात्मा है, उसके प्रमाद में जीव वासनारूप चित्त से विश्व की कल्पना करता है। वह विश्व शब्दमात्र है, अर्थात् कुछ नहीं। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा, समुद्र में तरङ्ग, मृगतृष्णा में जल और पल्लाही में बेताल भासित होता है, वैसे ही असम्यक्-दर्शी मनुष्य आत्मा में विश्व की कल्पना करता है। और सम्यक्-दर्शी ऐसे जानता है कि आत्मा शुद्ध, अजन्म, अविनाशी और परम निरञ्जन है।

हे राजन् ! जब तुम सम्यकदृष्टि में देखोगे, तब संसार का प्रध्वंसा-भाव भी न देखोगे; क्योंकि विश्व चित्त की कल्पना है और चित्त अज्ञान से उपजा है। स्वरूप में न चित्त है, न अज्ञान है और न संसार है, वह केवल अद्वैतमात्र है। वहाँ 'एक' कहाँ और 'द्वैत' कहाँ, वह तो केवल्य मात्र पद है। जब अज्ञान नष्ट होगा, तब 'अहं', 'त्वं' और चित्त का जगना, सब नष्ट हो जावेगा और फिर भ्रम दृष्टि में न आवेगा। हे राजन् ! आत्मा से भिन्न जो कुछ भासित होता है, वह अज्ञान के कारण और विचार करने में नहीं रहता। राजा बोले, हे भगवन् ! अज्ञान क्या है और कैसे उसका नाश होता है, सो कहिये। कुम्भज बोले, हे राजन् ! एक ज्ञान है और दूसरा अज्ञान। ज्ञान अर्थात् पदार्थ को प्रत्यक्ष जानना और अज्ञान अर्थात् पदार्थों को न जानना। एक ज्ञान भी अज्ञान है, सो भी सुनो। मृगतृष्णा का जल देखकर जल की आस्था करना, या रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा देखना और उसको सत्य मानना, यह ज्ञान भी अज्ञान है; क्योंकि देखनेवाला सम्यक्दर्शी होकर नहीं देखता। यह अज्ञान है। एक अज्ञान यह भी है कि शुद्ध

निर्वाण प्रकरण ❇ २४५

आत्मा निराकार और अच्युत है, उसमें मैं हूँ, और मेरा अमुक वर्णा- श्रम है, और यह विश्व नाना प्रकार का है। यह ज्ञान भी अज्ञान और मूर्खता है। हे राजन् ! न कोई जन्मता है और न कोई मृतक होता है। ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है। उसमें जन्म-मरण आदिक विकार देखना, यह ज्ञान भी अज्ञान है।

हे राजन् ! जैसे कोई ब्राह्मण हो और ऊँची बाँह करके कहे कि मैं शूद्र हूँ और मुझे वेद का अधिकार नहीं। या जैसे कोई पुरुष कहे कि मैं मृतक हूँ और उसको जानता हूँ, वैसे ही आपको कुछ वर्णाश्रम का अभिमान लेकर कहना मूर्खता है; क्योंकि यह असम्यग्दर्शन है। जब ज्यों का त्यों जानता है, तब दुःखी नहीं होता। हे राजन् ! ऐसा ज्ञान, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट हो जावे, सो अज्ञान ही है। जैसे सूर्य की किरणों में जल-बुद्धि होती है और किरण के ज्ञान से जल का ज्ञान नष्ट हो जाता है तो वह जल का जानना अज्ञान ही था, और जैसे रस्सी में सर्प जानना रस्सी के ज्ञान से नष्ट हो जाता है, तो वह सर्प- बुद्धि अज्ञान है, जो सम्यक्दर्शन से नष्ट होता है। जब ऐसे सम्यग्दर्शी होगे, तब आध्यात्मिक तापों से निवृत्त होकर शुद्ध होगे। आत्मा अज, शान्तरूप, सत्-असत् से परे है, उसमें भिन्न वस्तु कुछ नहीं। वह प्रकाश- रूप है। ऐसे तुम हो।

हे राजन् ! अज्ञान भी और कुछ नहीं। इस चित्त के उदय होने का ही नाम अज्ञान है। अज्ञान का कारण चित्त है। जो पदार्थ चित्त में प्रकट हुआ है, नष्ट भी चित्त से ही होता है। इससे तुम शुद्ध चित्त से वासनारूप चित्त का नाश करो। जैसे अग्नि पवन से उपजती है और पवन ही से शान्त होती है, वैसे ही शुद्ध चित्त से चित्त को नष्ट करो। हे राजन् ! न तुम हो, न मैं हूँ, न इन्द्रिय हैं, न संसार है और न यह जगत् है; केवल शुद्ध आत्मा है। हे राजन् ! जो चित्त ही न हो तो चित्त का कार्य विश्व कहाँ हो ? यह अज्ञानी को भासित होता है कि चित्त है और विश्व है। आत्मा केवल अपने आपमें स्थित है। हे राजन् ! चित्त का उदय होना अज्ञान से है। जब अज्ञान नष्ट होता

२९६ * योगवाशिष्ठ *

है, तब चित्त और 'अहं' 'त्वं' सब नष्ट हो जाते हैं। हे राजन् ! तुम शुद्ध आत्मा, एक, प्रकाशरूप, अच्युत और निरन्तर हो। देह इन्द्रिया-दिकरूप में भी तुम ही स्थित हुए हो और इच्छा-अनिच्छा भी तुम ही हो। जैसे चन्द्रमा की किरणें चन्द्रमा से भिन्न नहीं, वैसे ही तुम हो। तुम निर्विकल्प हो। तुममें कुछ स्फूर्ति नहीं। तुम केवल ज्यों का त्यों स्थित हो।

इति श्री वा० निर्वाणप्रकरणे परमार्थोपदेशो नामाशीतितमसर्गः ॥८०॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब कुम्भज मुनि ने ऐसे कहा, तब शिखिध्वज शान्ति को प्राप्त हुए और नेत्र मूँदकर सब अङ्गों की चेष्टा से रहित हुए। जैसे शिला पर पुतला लिखा हो, वैसे ही स्थित हो। एक मुहूर्त तक वह निर्विकल्प स्थित रहे और फिर उठे। तब कुम्भज ने कहा— हे राजन् ! आत्मा तो निर्विकल्प है, उस निर्विकल्प शिला में तुमने शयन किया है और ज्ञेय (जानने योग्य) को तुमने जाना है। अब तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ अथवा नहीं और तुम शान्ति को प्राप्त हुए या नहीं, सो कहो। राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा ने मुझे उसपद को प्राप्त किया है। हे भगवन् ! तत्त्ववेत्ताओं के सङ्ग से जैसा अमृत मिलता है, वैसा क्षीरसमुद्र में भी नहीं मिलता। वह तो देवताओं की सेवा में भी नहीं मिलता। तुम्हारी कृपा से मैंने ऐसे अमृत को पाया है, जिसका आदि-अन्त नहीं और जो अनन्त और अमृतरूप है। अब मेरे सब दुःख नष्ट हो गये हैं और मैं जागा हूँ। अब मैंने अपने आपको जाना है कि मैं आत्मा हूँ; मेरे साथ चित्त कोई नहीं और मैं केवल अपने आपमें स्थित हूँ। अब मुझे कोई इच्छा नहीं। मैंने अपने स्वभाव को पाया है और सबके आदि पद को प्राप्त हुआ हूँ। जिसमें कोई क्षोभ नहीं ऐसे निर्विकल्पपद को में प्राप्त हुआ हूँ। हे भगवन् ! ऐसा मेरा अपना रूप है, जिससे सब प्रकाशित होते हैं। उसके जाने बिना मैंने कोटि जन्म पाये थे। अब मेरे दुःख नष्ट हुए। और तुम्हारी कृपा से मैंने एक क्षण में जान लिया है। आगे भी श्रवण किया था; पर क्या कारण है जो आगे न जाना और अब जाना ?

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २४७

कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हारे कषाय (मन के मैल) परि-पक्व हुए हैं। जैसे फल परिपक्व होता है, तब यत्न बिना ही वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही अब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है और अज्ञान नष्ट हो गया है। जब अन्तःकरण मलीन होता है, तब सन्तों के वचन नहीं लगते और जब अन्तःकरण शुद्ध होता है, तब सन्तों के वचन लगते हैं। जैसे कोमल कमल की जड़ को बाण लगे तो शीघ्र ही वेध जाता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में उपदेश शीघ्र ही प्रवेश करता है। हे राजन् ! अब तुम्हारी भोग-वासना नष्ट हुई है और स्वरूप जानने की इच्छा हुई है; इसमें तुम जागे हो। हे राजन् ! मैंने उपदेश तब किया, जब तुम्हारा अन्तःकरण शुद्ध हुआ है। प्रतिबिम्ब भी वहाँ पड़ता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे श्वेत वस्त्र पर केशर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है और रङ्ग भी चटक होता है, वैसे ही शुद्ध अन्तःकरण में सन्तों के वचन शीघ्र ही प्रवेश करते हैं और शोभा पाते हैं। हे राजन् ! जब तक अन्तःकरण मलिन होता है, तब तक चाहे जितना उपदेश कीजिये, स्थिर नहीं होता। जब भोग से वैराग्य होता है, तब कोई वासना नहीं रहती, केवल आत्मपद की इच्छा होती है और तभी स्वरूप का साक्षात्कार होता है। हे राजन् ! अब तुम्हारा सर्वत्याग सिद्ध हुआ और अज्ञान नष्ट हुआ, क्योंकि अब कोई उपाधि नहीं रही। चित्त ही बड़ी उपाधि है। जब चित्त नष्ट हुआ, तब कोई दुःख नहीं रहता। अब तुम सुख से विचरो; तुमको दुःख, शोक और भय कोई नहीं। अब तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो।

राजा ने पूछा, हे भगवन् ! अज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध है और ज्ञानवान् को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जो स्वरूप में स्थित है, वह चित्त बिना जीवन्मुक्तक्रिया में कैसे बरतता है? कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम सच कहते हो कि ज्ञानी को चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। जैसे पत्थर की शिला में अंकुर नहीं उपजते, वैसे ही ज्ञानी का चित्त का सम्बन्ध नहीं होता। हे राजन् ! चित्त वासनारूप है और वासना जन्म-मरण का कारण; पर जीवन्मुक्त के वासना नहीं रहती। ज्ञानवान् का

१४८ * योगवाशिष्ठ *

चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और अज्ञानी चित्त में बँधा रहता है; इससे वह जन्मता भी है और मरता भी है। ज्ञानी का चित्त शान्ति में स्थित होने के कारण उसको न बन्धन है, न मोक्ष। वह प्रारब्ध के अनुसार भोग भोगता है और अपने को सर्वात्मा ही देखता है। यद्यपि इन्द्रियों से वह चेष्टा करता है तो भी सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। क्रिया करने में इस अभिमान से रहित होता है कि मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ। अज्ञानी अपने को कर्त्ता मानता है। उसको संसार सत्य भासित होता है, इससे संकल्प-विकल्प करता है। ज्ञानवान् को संसार की सत्यता नहीं भासित होती। वह अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता देखता है और अभिलाषा से रहित होकर चेष्टा करता है। जब तक चित्त का सम्बन्ध है, तब तक जीव संसार को सत्य जानकर अपने में क्रिया देखता है, पर जब चित्त ही नष्ट हो गया; तब संसार और वासना का जागना कहाँ रहा?

हे राजन्! अब तुमने चित्त का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हुए हो। आगे सर्वत्याग न किया था, इससे तुम्हारा अज्ञान न नष्ट हुआ था। अब तुम्हारा अहंभाव दूर हुआ है। जब अज्ञान नष्ट हुआ, तब अहंभाव भी न रहा। अहं का त्याग करने से सर्वत्याग सिद्ध हुआ। पहले तुमने राज्य का त्याग किया था, पर राज्य में तुम्हारा कुछ न था; फिर तन का त्याग किया; फिर वन में आकर सब सामग्री का त्याग किया। पर अब तुमने उसका त्याग किया, जो त्यागने योग्य अहंभाव है—इससे सर्वत्याग हुआ। जो कुछ जानने योग्य है सो अब तुमने जाना है और शान्तपद को प्राप्त हुए हो। हे राजन्! तुम सब दुःखों से रहित आत्मा हो। जैसे मन्दराचल पर्वत से रहित क्षीरसमुद्र शान्तपद को प्राप्त हुआ है, वैसे ही अज्ञान से रहित तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो। अब तुम जागे हो और चित्त का त्याग किया है, इससे अद्वैत सर्वात्मा हुए हो। हे राजन्! जब द्वैत या दो अक्षर होते हैं, तब उनकी संज्ञा नाना प्रकार की होती है—जैसे अमृत-विष; सुख-दुःख और धर्म-अधर्म। पर जो एक ही अक्षर होता है, वह

✹ निर्वाण प्रकरण ✹ २४६

सबका आत्मा है। तैसे ही तुम्हारा द्वैत अज्ञान नष्ट हुआ है और तुम सत्यपद को प्राप्त हुए शुद्ध निर्मल हो।

हे राजन् ! जो ज्ञानवान् है, उसने सम्यकदृष्टि से चित्त का त्याग किया है और उसको कोई दुःख नहीं होता। तू उस पद को प्राप्त हुआ है, जिसमें कोई दुःख नहीं और जहाँ स्वर्गादिक सुख भी तुच्छ हैं; क्योंकि स्वर्ग में भी अतिशय और क्षय होता है। अतिशय इसे कहते हैं कि जो बड़े पुण्यवाले किसी को अपने से ऊँचा देखते हैं तो चाहते हैं कि हम भी इसी के से हो जावें, और क्षय इसे कहते हैं कि ऐसा न हो कि इन सुखों से गिरूँ। निदान स्वर्ग में दोनों प्रकार दुःख होता है। पर तुमने पुण्य-पाप दोनों का त्याग किया है, इससे सर्वत्यागी हो। जो अज्ञानी पापी जीव हैं, उनको स्वर्ग ही भला है। जैसे सुवर्ण का पात्र न पाइये तो पीतल का भी भला, वैसे ही सुवर्ण का पात्र जो ज्ञान है, जब तक प्राप्त न हो तब तक पीतल के पात्र जो स्वर्गादिक हैं, वे नरक से भले हैं। पर तुम जैसे को कुछ नहीं। आत्मा में सब पदार्थों की पूर्णता है। सबकी उत्पत्ति आत्मा से ही है। हे राजन् ! वर्णाश्रम में क्या आस्था करनी है। जहाँ से इनकी उत्पत्ति है, जहाँ ये लीन होते हैं और मध्य में जिसके अज्ञान से देख पड़ते हैं, उसमें स्थित हो।

हे राजन् ! संकल्प-विकल्प जो उठते हैं, उनमें मत स्थित हो; किन्तु जिसमें ये उत्पन्न और लीन होते हैं, उसमें स्थित हो। तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जिससे तप आदिक सिद्ध होते हैं, उसमें स्थित हो। बूँद में क्या स्थित होना है। जिस मेघ से बूँद उत्पन्न होते हैं, उसमें स्थित होइये। हे राजन् ! जैसे स्त्री भर्ता से कोई पदार्थ चाहे और आप न कहे, वैसे ही तपादिक क्रिया से क्या सिद्ध होता है? जो उनसे आत्मपद को इच्छा करे तो प्राप्त नहीं हो सकता, उसे तो मनुष्य अपने आपमें पाता है। हे राजन् ! आत्मा तुम्हारा अपना आप है, उससे सर्वसिद्धि होता है। जो वस्तु पीछे त्याग करनी हो, उसको ज्ञानवान् प्रथम ही अङ्गीकार नहीं करता। जो कुछ तपादिक हैं, उनको

२५० ❉ योगवाशिष्ठ ❉

चित्त में क्या रचना है ? अपने आपको देखे कि अनुभवरूप है और सर्वदा निरन्तर अपने आपमें स्थित है । जब तुम अपने से आपको देखोगे, तब तपादिक क्रिया को दूर करके शोभा पाओगे । जैसे बादल के दूर होने पर प्रकाशमान चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही तुम भी भोग की चपलता को त्यागकर शोभा पाओगे । जब इन्द्रियों को जीतकर किसी पदार्थ में आसक्त न होगे और सर्ववासनाओं का त्याग करोगे, तब ज्ञानवान् होगे । जिसने सर्ववासना का त्याग किया है, उसको विष्णु जानना । वह सर्वराज्य का स्वामी है । जिसने मन जीता है वह चेष्टा में भी ज्यों का त्यों रहता है और समाधि में भी ज्यों का त्यों है । जैसे पवन चलने और ठहरने में तुल्य है, वैसे ही ज्ञानवान् को कहीं खेद नहीं होता । राजा ने पूछा, हे सर्व संशयों के नाशकर्ता ! स्पन्दन और निःस्पन्द में ज्ञानी ज्यों का त्यों कैसे रहता है, सो कृपा करके कहिये ।

कुम्भज बोले, हे राजन् ! चैतन्य आकाश आकाश में भी निर्मल है । जब उसका साक्षात्कार होता है, तब जहाँ देखे वहाँ चैतन्य ही भासित होता है । जैसे समुद्र के जानने में तरङ्ग और बुलबुले सब जल ही दीखते हैं, वैसे ही चित्त बिना आत्मा के देखने में फुरने में भी आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है । और जिसने आत्मा को नहीं जाना, उसको नाना प्रकार का जगत ही भासित होता है । जैसे जल को जाने बिना तरङ्ग व बुलबुले भिन्न भिन्न दीखते हैं और जल को जानने में तरङ्ग भी जलमय दीखते हैं । हे राजन् ! सम्यक्दर्शी को जगत आत्मास्वरूप है और असम्यक्दर्शी को जगत है । इसमें तुम सम्यक्-दर्शी होकर देखो कि जगत भी आत्मरूप है, सम्यक्दर्शी जैसे प्राप्त होता है, सो भी श्रवण करो । सम्यक्दर्शन संत के संग और सत-शास्त्र के विचार से प्राप्त होता है । भावना करिये, तब कितने काल में स्वरूप का साक्षात्कार होता है । दृढ विचार के निमित्त काल की अपेक्षा भी कही है । जब दृढ विचार होता है, तब साक्षात्कार होता है और जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब स्पन्दन और निःस्पन्द

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ २५१

में जीव एक समान होता है। हे राजन् ! जिसके समीप शहद है, वह शहद के निमित्त पर्वत क्यों खोजे और दौड़े, वैसे ही तुम्हारे घर में ब्रह्मज्ञानी चूडाला थी; उसको त्यागकर तुमने वन में आकर तप का आरम्भ किया, इससे बड़ा कष्ट पाया। परन्तु अब तुम जागे हो और तुम्हारा दुःख नष्ट हुआ है। अब तुम शान्तपद को प्राप्त हुए हो। जैसे रस्सी को न जानने से सर्प दिखता है और भली प्रकार जानने से रस्सी ही जान पड़ती, वैसे ही, जिसने भली प्रकार निष्पन्द होकर अपना रूप आप देखा है, उसको चित्त के स्फुरण में भी आत्मा ही भासित होता है। जब मन की चपलता मिटती है, तब तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है; जिस पद को वाणी नहीं कह सकती। हे राजन् ! तुम भी अब उसी पद को प्राप्त हुए हो, जो मन और वाणी से रहित तुरीयातीतपद है। वहाँ कोई क्षोभ नहीं, केवल शान्तिपद है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखरध्वजबोधवर्णनंनाम-
काशीतितमसर्गः ॥ ८१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब राजा को कुम्भज मुनि ऐसे उपदेश कर चुके, तब उसके उपरान्त बोले, हे राजन् ! अब हम जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग में ब्रह्माजी के पास नारद मुनि आये हैं। वे यदि मुझे देवताओं की सभा में न देखेंगे तो क्रोध करेंगे। हे राजन् ! जो कल्याणकृत पुरुष हैं, वे बड़ों की प्रसन्नता लेते हैं। जो उपदेश तुम्हें किया है; उसको भली प्रकार विचारना। सब शास्त्रों का सार यही है कि सम्पूर्ण वासना का त्याग करना और किसी में चित्त का बन्धन न होने देना। मेरे आने तक स्वरूप में स्थित रहकर किसी चेष्टा में न लगना और स्वरूप को भली प्रकार जानकर चाहे वैसे विचारना। ऐसे कहकर जब कुम्भज मुनि उठ खड़े हुए, तब राजा ने अर्घ्य और फल चढ़ाने के निमित्त हाथ में लिये, पर जल और फूल हाथ ही में रहे और कुम्भज मुनि अन्तर्धान हो गये। जब राजा ने कुम्भज मुनि को अपने आगे न देखा, तब विचार करने लगा कि देखा, ईश्वर की नीति जानी नहीं जाती। नारद मुनि कहाँ थे, उनका पुत्र कुम्भज कहाँ और मैं राजा

२५२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

शिखध्वज कहाँ ? मालूम होता है, उसी नीति ने कुम्भज मुनि का रूप धारणकर मुझको जगाया है। कुम्भज बड़ा महात्मा मुनि है जिसने मुझे उपदेश करके जगाया है। अब मैं अज्ञानरूपी गड्ढे से निकलकर स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ। मेरे सम्पूर्ण संशय नष्ट हुए हैं और मैं निर्दुःख पद में स्थित होकर अज्ञाननिद्रा से जागा हूँ-बड़ा आश्चर्य है।

हे राम ! ऐसा कहकर राजा शिखरध्वज सम्पूर्ण इन्द्रियों, प्राण और मन को स्थिर करके चेष्टा से रहित हुआ और जैसे शिला के ऊपर पुतली लिखी होती है और पर्वत का शिखर स्थित होता है, वैसे ही स्थित हुआ। उधर चूड़ाला कुम्भजरूप शरीर का त्यागकर और अपना सुन्दर रूप धारण कर उड़ी और आकाश को लाँघकर अपने नगर में आई। अन्तःपुर में जहाँ स्त्रियाँ रहती थीं, प्रवेश करके मन्त्रियों को आज्ञा दी कि तुम अपने-अपने स्थान में स्थित हो और आप राजा के स्थान में स्थित होकर भली प्रकार प्रजा की खबर लेने लगी। निदान तीन दिन रहकर फिर वहाँ से उड़ी और जहाँ वन में राजा था वहाँ आ पहुँची और कुम्भज का रूप रखकर देखा कि राजा समाधि में स्थित है, इससे बहुत प्रसन्न हुई। हे राम ! ऐसे प्रसन्न होकर चूड़ाला ने विचार किया कि बड़े सुख का कार्य हुआ कि राजा ने स्वरूप में स्थिति पाई और शान्ति को प्राप्त हुआ। फिर यह विचार कर कि इसको जगाऊँ, सिंह की नाईं गर्जी और ऐसा शब्द किया कि उससे वन के सब पशु पक्षी डर गये, परन्तु राजा न जागा। फिर उसे हाथ से हिलाया तो भी राजा न जागा। जैसे मेघ के शब्द से पर्वत का शिखर चलायमान नहीं होता, वैसे ही राजा चलायमान न हुआ और काष्ठ और पाषाण की नाईं स्थित रहा।

तब रानी ने विचार किया कि कहीं राजा शरीर को त्याग न दे। पर फिर विचार किया कि जो राजा ने शरीर का त्याग किया हो तो मैं भी शरीर त्याग दूँगी। हे राम ! चूड़ाला ने शरीर न त्यागा, परन्तु विचार करने लगी कि राजा और मुझको इकट्ठा शरीर त्यागना है। फिर विचार करने लगी कि इसका भविष्य क्या होना है। तब राजा के नेत्रों पर

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २५३

हाथ लगाया और देह में देह का स्पर्श कर देखा कि राजा के शरीर में प्राण हैं। फिर भविष्य का विचार किया कि इसका सत्त्व शेष रहता है, इससे जीवन्मुक्त होकर राज्य में विचरेगा। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने कहा कि राजा काष्ठ और पाषाण की नाईं स्थित हुआ और फिर कहा कि कुम्भज ने हाथ लगाकर देखा कि इसमें प्राण हैं तो कुम्भज ने क्योंकर जाना ? यह मुझको संशय है, सो दूर करो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस शरीर में पुर्यष्टका होती है, उसमें कान्ति होती है। हे राम! अज्ञानी का चित्त रहता है और ज्ञानी का सत्त्व रहता है, जो प्रारब्ध के वेग से जगता है और ब्रह्माकार वृत्ति जगने से फिर शरीर पाता है। ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट में एक समान रहता है और अज्ञानी एक समान नहीं रहता; वह इष्ट में प्रसन्न और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान् होता है।

हे राम! ज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब ब्रह्मसमुद्र में स्थित होता है, और जब तक सत्त्व शेष है, तबतक चेतना काम करती है। अज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब उसमें सूक्ष्म संसार होता है—जैसे बीज में वृक्ष, फूल और फल सूक्ष्मता से स्थित होता है और काल पाकर फिर निकलता है, उसी प्रकार राजा का सत्त्व शेष रहता था, इस कारण फिर वह जगेगा। तब कुम्भजरूप चूडाला ने विचार किया कि इसके भीतर प्रवेश करके जगाऊँ। जो मैं न जगाऊँगी तो भी नियति से इसे जागना है। ऐसे विचारकर उसने अपने शरीर को त्यागा और चेतनता में स्थित हो; चेतना को लेकर उसमें प्रवेश किया, और उसकी चेतनता का जो सत्त्व शेष था, उसको फोड़ा और बड़ा क्षोभ किया। जब राजा वहाँ मे हिला, तब आप निकल आई और अपने शरीर में प्रवेश किया। जैसे पखेरू आकाश में उड़ता है और फिर झाँझ में आकर प्रवेश करता है, वैसे ही वह अपने शरीर में आकर स्थित हुई और साम-वेद का गायन मधुर स्वर से करने लगी।

राजा यह सुनकर कि कोई सामवेद गाता है, जागा और देखा कि कुम्भज मुनि बैठे हैं। इन्हें देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और फूल और जल

२५४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

चढ़ाकर बोला, हे भगवन् ! मेरे बड़े भाग्य हैं-मैं आपका दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुआ । हे भगवन् ! कुम्भरूपी कुलाचल पर्वत है, उसमें जो देह-रूपी वृक्ष है, वह अब फूला है और तुमने हमको पावन किया है । हे भगवन् ! किसी की सामर्थ्य नहीं कि तुम जैसों के चित्त में प्रवेश करे । जिसमें सर्वदा आत्मा का निवास है, उस चित्त में मेरी स्मृति हुई है, जिससे आपका दर्शन पाया । इससे मेरे बड़े भाग्य हैं । हे भगवन् ! अमृतरूपी वचनों से तुमने प्रथम मुझे पवित्र किया था और अब स्मरण करके मुझे और पावन किया है । कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम्हार दर्शन करके में भी बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और तुम्हारी जैसी प्रीति मैंने आगे किसी में नहीं देखी । हे राजन् ! तुम्हारे निमित्त मैं स्वर्ग में आया हूँ । स्वर्ग के सुख मुझे भले न लगे और तुम बहुत प्रियतम हो, इसी से मैं आया हूँ । अब में स्वर्ग को भी न जाऊूँगा, तुम्हारे ही पास रहूँगा । राजा बोले, हे भगवन् ! जिस पर तुम जैसों की कृपा होती है, उसको स्वर्ग आदिक सुख भले नहीं लगते तो तुम्हारी क्या बात है ? यह वन है और यह झोंपड़ी है, इसमें विश्राम करो; मेरे बड़े भाग्य हैं, जो तुम्हारा चित्त यहाँ लगता है ।

कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हें शान्ति प्राप्त हुई है और संकल्प-रूप बीज नष्ट हुआ है । जैसे नदी के किनारे पर की बेलि जल के प्रवाह से मूलसमेत गिरती है, वैसे ही तुम्हारे संकल्पबीज नष्ट हुए हैं । अब तुम यथाप्राप्ति में सन्तुष्ट हो कि नहीं और हेयोपादेय से रहित हुए हो कि नहीं और जो पाने योग्य पद है सो पाया है कि नहीं ? अपना अनुभव कहो । राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैंने सबसे श्रेष्ठ पद पाया है, जहाँ संसारसीमा का अन्त है । अब मुझे उपदेश का अधिकार नहीं रहा; क्योंकि मेरे सम्पूर्ण संशय नष्ट हुए हैं और हेयोपादेय से रहित हूँ, इसमें सुखी विचड़ता है । जो कुछ जानना चाहिये था सो भी मैंने जाना है । अब मुझको कोई संशय नहीं रहा और में सब ठौर तृप्त, नित्य, नामरूप आत्मा अपने निर्मल स्वभाव में स्थित, सर्वात्मा और निर्विकल्प हूँ ।

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २५५

मुझमें कोई वासना नहीं; मैं शान्तरूप और चिरपर्यन्त सुखी हूँ।

इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार राजा और कुम्भज का तीन मुहूर्त्त संवाद हुआ। फिर उसके उपरान्त दोनों उठ खड़े हुए और चले। निकट एक तालाव था, जहाँ बहुत कमलिनी लगी थीं। वहाँ पहुँच दोनों ने स्नान करके गायत्रीजप और सन्ध्या की और पूजा करके फिर वहाँ से चले और वन कुञ्जों में आये। तब कुम्भज ने कहा, चलिये। राजा ने कहा, अच्छी बात है चलिये। निदान दोनों चले और बहुत नगरों, देशों, ग्रामों और तीर्थों को देखते हुए नाना प्रकार के वनों में, जो फूल और फलसंयुक्त थे, और मरुस्थल में विचरे। हे राम! ऐसे तीर्थ आदिक सात्त्विकी स्थानों, सुन्दर वन आदिक राजसी स्थानों और मरुस्थलादिक तापसी स्थानों में वे विचरे पर हर्ष या शोक को न प्राप्त हुए और समता में रहे। हे राम! कुम्भज के फिरने का यह प्रयोजन था कि देखें, राजा शुभ-अशुभ स्थानों को देखकर हर्ष-शोक करेगा अथवा न करेगा। पर राजा हर्ष-शोक को न प्राप्त हुआ। फिर उन्होंने बड़े पर्वतों की कन्दरा, वन कुञ्ज और बड़े दुर्गम स्थान देखे और एक बन में जा रहे। कुछ काल में राजा और कुम्भज एक ही में हो गये। दोनों इकट्ठे स्नान करें; एक ही में जप जपें; एक सी पूजा करें। दोनों एक से सुहृद् हुए। किसी ठौर वे शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर चन्दन का लेप करते, किसी ठौर शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर दिव्य वस्त्र पहिनते, किसी ठौर केले के पत्तों पर सोते, किसी ठौर फूल की शय्या पर और कभी कष्टदायक स्थानों में शयन करते।

हे राम! ऐसे शुभ-अशुभ ठौरों में भी वे ज्यों के त्यों रहे और हर्ष-शोक को न प्राप्त हुए। केवल शुद्ध सत्त्व में वे दोनों स्थित रहे और आत्मा के सिवा और कुछ न फुरा। एक बार रानी के मन में विचार हुआ कि यह मेरा भर्ता है, मैं इसको भोगूँ, क्योंकि हमारी यही अवस्था है। जो भले कुल की स्त्री हैं, वे भर्ता को प्रसन्न रखती हैं। राजा का शरीर भी देवता का सा हो गया है और स्थान भी शुभ है। जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी साथ हैं। फिर विचार किया कि राजा की

२५६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

परीक्षा भी करूँ कि क्या कहता है । इतना विचारकर कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! अब हम स्वर्ग में जाते हैं, क्योंकि चैत्रशुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि उत्पन्न की है; इसी दिन वर्ष के वर्ष उत्सव होता है । और वहाँ नारदमुनि भी आवेंगे । मेरे आने तक तुम समाधि में रहना । जब समाधि से उतरोगे तो फूलों को देखना । ऐसे कहकर उसने फूलों की मञ्जरी राजा को दी और राजा ने भी कुम्भज को फूल की मञ्जरी दी । जैसे नन्दनवन में स्त्री भर्ता के हाथ में दे और भर्ता स्त्री के हाथ में दे, वैसे ही परस्पर दोनों ने दी । फिर कुम्भज आकाश को उड़ा और जैसे मेघ को मोर देखता है, वैसे ही राजा देखता रहा । जहाँ तक राजा की दृष्टि जाती थी, वहाँ तक रानी ने कुम्भज का शरीर रखा और जब दृष्टि से अगोचर हुई तब फूलों की माला जो गले में थी। तोड़कर राजा के ऊपर डाल दी और चुड़ाला का शरीर धारणकर आकाश को लाँघ अपने अन्तःपुर में पहुँची । निदान राजा के स्थान पर बैठकर सबको अपने-अपने स्थानों में स्थित किया और प्रजा की खबरें सुनकर फिर उड़ी । सूर्य की किरणों के मार्ग से मेघमण्डल को लाँघती हुई जहाँ राजा का स्थान था, वहाँ आकर देखा कि राजा वियोग से शोकवान् है, इसलिए आप भी कुम्भज के रूप में उदास राजा के आगे आई ।

राजा ने कहा, हे भगवन् ! तुमको शोक कैसे हुआ है ? ऐसा कौन कष्ट तुमको मार्ग में हुआ है ? सब दुःखों का नष्ट करनेवाला ज्ञान है । जो तुम ऐसे ज्ञानवानों को शोक हो तो औरों की क्या बात कहनी है । हे मुनि ! तुमको दुःख का कारण कोई नहीं, तुम क्यों शोकवान् होते हो, तुमको कौन अनिष्ट प्राप्त हुआ है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! मुझको एक दुःख है, सो कहता हूँ । जो मित्र बूझे तो मन ही कहना चाहिए और दुःख भी नष्ट होता है जैसे मेघ जड़ और श्याम होता है और उसका स्वजन जो खेत और पृथ्वी हैं, उनके ऊपर वह वर्षा करता है तो उसकी जड़ता और श्यामता नष्ट होती है—इससे मैं तुमसे कहता हूँ । हे राजन् ! जबतक स्वर्ग में सभा स्थित थी, तबतक मैं नारद के पास

  • निर्वाण प्रकरण * २५७

रहा । जब सभा उठी, तब नारदमुनि भी उठे और मुझसे कहा कि जहाँ तेरी इच्छा हो, वहाँ जा और मैं भी जाता हूँ । नारद एक ही जगह में नहीं ठहरते, विश्व में घूमते फिरते हैं । तब मैं आकाश को चला तो एक जगह सूर्य से मिलाप हुआ और में मेघमार्ग में तीव्र वेग से चला । जैसे नदी पर्वत से तीव्र वेग से आती है, वैसे ही में तीव्र वेग से चला आता था । मैंने देखा कि दुर्वासा ऋषीश्वर महामेघ की तरह श्यामवस्त्र पहिने हुए और भूषणसंयुक्त जैसे बिजली का चमत्कार होता है, वेगे उड़े आते हैं । भूषणों का चमत्कार देखकर मैंने दण्डवत् करके कहा, हे मुनीश्वर ! तुमने क्या रूप धरा है जो स्त्रियों का सा लगता है ?

दुर्वासा ने तब रुष्ट होकर मुझसे कहा, हे ब्रह्मा के पौत्र ! तू क्या कहता है ? ऐसा मुनीश्वर के प्रति कहना उचित नहीं । हम क्षेत्र हैं; जैसा बीज क्षेत्र में बोइये वैसा ही उगता है । तूने मुझे स्त्री कहा है, इससे तू भी स्त्री होगा और रात्रि को तेरे सब अंग स्त्री के हो जायँगे । हे मुनीश्वर ! जो कल्याणकृत ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनमें नम्रता होती है । जैसे फल-संयुक्त वृक्ष नम्र होता है, वैसे ही ज्ञानी भी नम्र होता है । ऐसे वचन तुझे न कहना चाहिए । हे राजन् ! यह सुनकर मैं तुम्हारे पास चला आया हूँ और मुझे लज्जा आती है कि स्त्री का शरीर रखकर देवताओं के साथ में कैसे विचरूँगा—यही मुझको सोच है । राजा ने कहा, क्या हुआ जो दुर्वासा ने कहा और स्त्री का शरीर हुआ । तुम तो शरीर नहीं, निर्लेप आत्मा हो । हे मुनीश्वर ! तुम अपनी समता में स्थित रहते हो । ज्ञानवान् पुरुष को हेय उपादेय कुछ नहीं रहता । वह तो अपनी समता में स्थित रहता है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! तुम सत्य कहते हो । मुझे क्या दुःख है ? जो शरीर का प्रारब्ध है, सो होता है । यह ईश्वर का नियम है कि जब तक शरीर रहता है, तब तक शरीर के स्वभाव भी रहते हैं । शरीर का स्वभाव त्याग करना भी मूर्खता है । जिस स्थान में ज्ञान की प्राप्ति हो, उसी चेष्टा में विचरिये । इन्द्रियों को रोकना और मन में विषय की चिन्तना करना भी मूर्खता है । इन्द्रियों और देह की

२५८ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

चेष्टा ज्ञानवान् भी करते हैं; परन्तु उसमें बँधते नहीं। इन्द्रियाँ विषय में वरतती हैं। ईश्वर का आदि नियम इसी प्रकार है।

हे राजन्! नियम या नीति का त्याग किसी में नहीं किया जाता-इससे उसका क्यों त्याग करिये। यह नीति है कि जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जैसे जब तक तिल है, तब तक तेल भी होता है; वैसे ही जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे देह और इन्द्रियों में चेष्टा भी करते हैं, परन्तु उसमें बँधते नहीं। पर अज्ञानी उसमें बँध जाते हैं। चेष्टा तो ज्ञानी भी करते हैं, अज्ञानी भी करते हैं। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे सब चेष्टाएँ करते हैं, परन्तु किसी में नहीं बँधते। हे राजन्! वैसे जो अनिच्छित आकार प्राप्त हो और जिसको शास्त्र प्रमाण करें, उसको भोगने में कुछ दोष नहीं। राजा बोले, हे भगवन्! ज्ञानवान् को दोष कुछ नहीं। जो सत्ता समान में स्थित है, उसे कुछ दोष नहीं होता। अज्ञानी शरीर के दुःख अपने में देखता है, उनमे दुःखी होता है और ज्ञानवान् शरीर के दुःख अपने में नहीं देखता। हे राम! इतने में सूर्य अस्त हुआ। तब राजा और कुम्भज दोनों ने सायंकाल में सन्ध्या करके जप किया। जब रात्रि हुई, तारागण निकले और सूर्यमुखी कमलों के मुख मूँद गये, तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! देखो, मेरे सिर के बाल बढ़ते जाते हैं, वस्त्र भी टखने तक हो गये हैं और स्तन भी स्त्री की नाईं हैं।

निदान चुड़ाला लक्ष्मी की नाईं महासुन्दर स्त्री हो गई। उसको देखकर राजा को एक मुहूर्त्त शोक रहा। उसके उपरान्त सावधान होकर बोला, हे मुनि! क्या हुआ जो तुम्हारा शरीर स्त्री का हुआ? तुम तो शरीर नहीं, आत्मा हो-इससे शोक क्यों करते हो? तुम अपनी सत्ता समान में स्थित रहो। जब रात्रि हुई तब रानी ने महासुन्दर रूप रचकर फूलों की शय्या बिछाई और उस पर दोनों इकट्ठे सोये। हे राम! समस्त रात्रि उनकी कोई वासना नहीं जागी। दोनों सत्ता समान में स्थित रहे और मुखमे कुछ न बोले। जब प्रातःकाल हुआ, तब फिर रानी