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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1061, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1061

२५२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

शिखध्वज कहाँ ? मालूम होता है, उसी नीति ने कुम्भज मुनि का रूप धारणकर मुझको जगाया है। कुम्भज बड़ा महात्मा मुनि है जिसने मुझे उपदेश करके जगाया है। अब मैं अज्ञानरूपी गड्ढे से निकलकर स्वरूप को प्राप्त हुआ हूँ। मेरे सम्पूर्ण संशय नष्ट हुए हैं और मैं निर्दुःख पद में स्थित होकर अज्ञाननिद्रा से जागा हूँ-बड़ा आश्चर्य है।

हे राम ! ऐसा कहकर राजा शिखरध्वज सम्पूर्ण इन्द्रियों, प्राण और मन को स्थिर करके चेष्टा से रहित हुआ और जैसे शिला के ऊपर पुतली लिखी होती है और पर्वत का शिखर स्थित होता है, वैसे ही स्थित हुआ। उधर चूड़ाला कुम्भजरूप शरीर का त्यागकर और अपना सुन्दर रूप धारण कर उड़ी और आकाश को लाँघकर अपने नगर में आई। अन्तःपुर में जहाँ स्त्रियाँ रहती थीं, प्रवेश करके मन्त्रियों को आज्ञा दी कि तुम अपने-अपने स्थान में स्थित हो और आप राजा के स्थान में स्थित होकर भली प्रकार प्रजा की खबर लेने लगी। निदान तीन दिन रहकर फिर वहाँ से उड़ी और जहाँ वन में राजा था वहाँ आ पहुँची और कुम्भज का रूप रखकर देखा कि राजा समाधि में स्थित है, इससे बहुत प्रसन्न हुई। हे राम ! ऐसे प्रसन्न होकर चूड़ाला ने विचार किया कि बड़े सुख का कार्य हुआ कि राजा ने स्वरूप में स्थिति पाई और शान्ति को प्राप्त हुआ। फिर यह विचार कर कि इसको जगाऊँ, सिंह की नाईं गर्जी और ऐसा शब्द किया कि उससे वन के सब पशु पक्षी डर गये, परन्तु राजा न जागा। फिर उसे हाथ से हिलाया तो भी राजा न जागा। जैसे मेघ के शब्द से पर्वत का शिखर चलायमान नहीं होता, वैसे ही राजा चलायमान न हुआ और काष्ठ और पाषाण की नाईं स्थित रहा।

तब रानी ने विचार किया कि कहीं राजा शरीर को त्याग न दे। पर फिर विचार किया कि जो राजा ने शरीर का त्याग किया हो तो मैं भी शरीर त्याग दूँगी। हे राम ! चूड़ाला ने शरीर न त्यागा, परन्तु विचार करने लगी कि राजा और मुझको इकट्ठा शरीर त्यागना है। फिर विचार करने लगी कि इसका भविष्य क्या होना है। तब राजा के नेत्रों पर