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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1062, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1062

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २५३

हाथ लगाया और देह में देह का स्पर्श कर देखा कि राजा के शरीर में प्राण हैं। फिर भविष्य का विचार किया कि इसका सत्त्व शेष रहता है, इससे जीवन्मुक्त होकर राज्य में विचरेगा। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने कहा कि राजा काष्ठ और पाषाण की नाईं स्थित हुआ और फिर कहा कि कुम्भज ने हाथ लगाकर देखा कि इसमें प्राण हैं तो कुम्भज ने क्योंकर जाना ? यह मुझको संशय है, सो दूर करो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस शरीर में पुर्यष्टका होती है, उसमें कान्ति होती है। हे राम! अज्ञानी का चित्त रहता है और ज्ञानी का सत्त्व रहता है, जो प्रारब्ध के वेग से जगता है और ब्रह्माकार वृत्ति जगने से फिर शरीर पाता है। ज्ञानी इष्ट-अनिष्ट में एक समान रहता है और अज्ञानी एक समान नहीं रहता; वह इष्ट में प्रसन्न और अनिष्ट की प्राप्ति में शोकवान् होता है।

हे राम! ज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब ब्रह्मसमुद्र में स्थित होता है, और जब तक सत्त्व शेष है, तबतक चेतना काम करती है। अज्ञानी जब शरीर को त्यागता है, तब उसमें सूक्ष्म संसार होता है—जैसे बीज में वृक्ष, फूल और फल सूक्ष्मता से स्थित होता है और काल पाकर फिर निकलता है, उसी प्रकार राजा का सत्त्व शेष रहता था, इस कारण फिर वह जगेगा। तब कुम्भजरूप चूडाला ने विचार किया कि इसके भीतर प्रवेश करके जगाऊँ। जो मैं न जगाऊँगी तो भी नियति से इसे जागना है। ऐसे विचारकर उसने अपने शरीर को त्यागा और चेतनता में स्थित हो; चेतना को लेकर उसमें प्रवेश किया, और उसकी चेतनता का जो सत्त्व शेष था, उसको फोड़ा और बड़ा क्षोभ किया। जब राजा वहाँ मे हिला, तब आप निकल आई और अपने शरीर में प्रवेश किया। जैसे पखेरू आकाश में उड़ता है और फिर झाँझ में आकर प्रवेश करता है, वैसे ही वह अपने शरीर में आकर स्थित हुई और साम-वेद का गायन मधुर स्वर से करने लगी।

राजा यह सुनकर कि कोई सामवेद गाता है, जागा और देखा कि कुम्भज मुनि बैठे हैं। इन्हें देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और फूल और जल