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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1063, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1063

२५४ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

चढ़ाकर बोला, हे भगवन् ! मेरे बड़े भाग्य हैं-मैं आपका दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुआ । हे भगवन् ! कुम्भरूपी कुलाचल पर्वत है, उसमें जो देह-रूपी वृक्ष है, वह अब फूला है और तुमने हमको पावन किया है । हे भगवन् ! किसी की सामर्थ्य नहीं कि तुम जैसों के चित्त में प्रवेश करे । जिसमें सर्वदा आत्मा का निवास है, उस चित्त में मेरी स्मृति हुई है, जिससे आपका दर्शन पाया । इससे मेरे बड़े भाग्य हैं । हे भगवन् ! अमृतरूपी वचनों से तुमने प्रथम मुझे पवित्र किया था और अब स्मरण करके मुझे और पावन किया है । कुम्भज बोले, हे राजन् ! तुम्हार दर्शन करके में भी बहुत प्रसन्न हुआ हूँ और तुम्हारी जैसी प्रीति मैंने आगे किसी में नहीं देखी । हे राजन् ! तुम्हारे निमित्त मैं स्वर्ग में आया हूँ । स्वर्ग के सुख मुझे भले न लगे और तुम बहुत प्रियतम हो, इसी से मैं आया हूँ । अब में स्वर्ग को भी न जाऊूँगा, तुम्हारे ही पास रहूँगा । राजा बोले, हे भगवन् ! जिस पर तुम जैसों की कृपा होती है, उसको स्वर्ग आदिक सुख भले नहीं लगते तो तुम्हारी क्या बात है ? यह वन है और यह झोंपड़ी है, इसमें विश्राम करो; मेरे बड़े भाग्य हैं, जो तुम्हारा चित्त यहाँ लगता है ।

कुम्भज बोले, हे राजन् ! अब तुम्हें शान्ति प्राप्त हुई है और संकल्प-रूप बीज नष्ट हुआ है । जैसे नदी के किनारे पर की बेलि जल के प्रवाह से मूलसमेत गिरती है, वैसे ही तुम्हारे संकल्पबीज नष्ट हुए हैं । अब तुम यथाप्राप्ति में सन्तुष्ट हो कि नहीं और हेयोपादेय से रहित हुए हो कि नहीं और जो पाने योग्य पद है सो पाया है कि नहीं ? अपना अनुभव कहो । राजा बोले, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैंने सबसे श्रेष्ठ पद पाया है, जहाँ संसारसीमा का अन्त है । अब मुझे उपदेश का अधिकार नहीं रहा; क्योंकि मेरे सम्पूर्ण संशय नष्ट हुए हैं और हेयोपादेय से रहित हूँ, इसमें सुखी विचड़ता है । जो कुछ जानना चाहिये था सो भी मैंने जाना है । अब मुझको कोई संशय नहीं रहा और में सब ठौर तृप्त, नित्य, नामरूप आत्मा अपने निर्मल स्वभाव में स्थित, सर्वात्मा और निर्विकल्प हूँ ।