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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1064

✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २५५

मुझमें कोई वासना नहीं; मैं शान्तरूप और चिरपर्यन्त सुखी हूँ।

इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार राजा और कुम्भज का तीन मुहूर्त्त संवाद हुआ। फिर उसके उपरान्त दोनों उठ खड़े हुए और चले। निकट एक तालाव था, जहाँ बहुत कमलिनी लगी थीं। वहाँ पहुँच दोनों ने स्नान करके गायत्रीजप और सन्ध्या की और पूजा करके फिर वहाँ से चले और वन कुञ्जों में आये। तब कुम्भज ने कहा, चलिये। राजा ने कहा, अच्छी बात है चलिये। निदान दोनों चले और बहुत नगरों, देशों, ग्रामों और तीर्थों को देखते हुए नाना प्रकार के वनों में, जो फूल और फलसंयुक्त थे, और मरुस्थल में विचरे। हे राम! ऐसे तीर्थ आदिक सात्त्विकी स्थानों, सुन्दर वन आदिक राजसी स्थानों और मरुस्थलादिक तापसी स्थानों में वे विचरे पर हर्ष या शोक को न प्राप्त हुए और समता में रहे। हे राम! कुम्भज के फिरने का यह प्रयोजन था कि देखें, राजा शुभ-अशुभ स्थानों को देखकर हर्ष-शोक करेगा अथवा न करेगा। पर राजा हर्ष-शोक को न प्राप्त हुआ। फिर उन्होंने बड़े पर्वतों की कन्दरा, वन कुञ्ज और बड़े दुर्गम स्थान देखे और एक बन में जा रहे। कुछ काल में राजा और कुम्भज एक ही में हो गये। दोनों इकट्ठे स्नान करें; एक ही में जप जपें; एक सी पूजा करें। दोनों एक से सुहृद् हुए। किसी ठौर वे शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर चन्दन का लेप करते, किसी ठौर शरीर में भस्म लगाते, किसी ठौर दिव्य वस्त्र पहिनते, किसी ठौर केले के पत्तों पर सोते, किसी ठौर फूल की शय्या पर और कभी कष्टदायक स्थानों में शयन करते।

हे राम! ऐसे शुभ-अशुभ ठौरों में भी वे ज्यों के त्यों रहे और हर्ष-शोक को न प्राप्त हुए। केवल शुद्ध सत्त्व में वे दोनों स्थित रहे और आत्मा के सिवा और कुछ न फुरा। एक बार रानी के मन में विचार हुआ कि यह मेरा भर्ता है, मैं इसको भोगूँ, क्योंकि हमारी यही अवस्था है। जो भले कुल की स्त्री हैं, वे भर्ता को प्रसन्न रखती हैं। राजा का शरीर भी देवता का सा हो गया है और स्थान भी शुभ है। जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी साथ हैं। फिर विचार किया कि राजा की

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