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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1065, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1065

२५६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

परीक्षा भी करूँ कि क्या कहता है । इतना विचारकर कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! अब हम स्वर्ग में जाते हैं, क्योंकि चैत्रशुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्माजी ने सृष्टि उत्पन्न की है; इसी दिन वर्ष के वर्ष उत्सव होता है । और वहाँ नारदमुनि भी आवेंगे । मेरे आने तक तुम समाधि में रहना । जब समाधि से उतरोगे तो फूलों को देखना । ऐसे कहकर उसने फूलों की मञ्जरी राजा को दी और राजा ने भी कुम्भज को फूल की मञ्जरी दी । जैसे नन्दनवन में स्त्री भर्ता के हाथ में दे और भर्ता स्त्री के हाथ में दे, वैसे ही परस्पर दोनों ने दी । फिर कुम्भज आकाश को उड़ा और जैसे मेघ को मोर देखता है, वैसे ही राजा देखता रहा । जहाँ तक राजा की दृष्टि जाती थी, वहाँ तक रानी ने कुम्भज का शरीर रखा और जब दृष्टि से अगोचर हुई तब फूलों की माला जो गले में थी। तोड़कर राजा के ऊपर डाल दी और चुड़ाला का शरीर धारणकर आकाश को लाँघ अपने अन्तःपुर में पहुँची । निदान राजा के स्थान पर बैठकर सबको अपने-अपने स्थानों में स्थित किया और प्रजा की खबरें सुनकर फिर उड़ी । सूर्य की किरणों के मार्ग से मेघमण्डल को लाँघती हुई जहाँ राजा का स्थान था, वहाँ आकर देखा कि राजा वियोग से शोकवान् है, इसलिए आप भी कुम्भज के रूप में उदास राजा के आगे आई ।

राजा ने कहा, हे भगवन् ! तुमको शोक कैसे हुआ है ? ऐसा कौन कष्ट तुमको मार्ग में हुआ है ? सब दुःखों का नष्ट करनेवाला ज्ञान है । जो तुम ऐसे ज्ञानवानों को शोक हो तो औरों की क्या बात कहनी है । हे मुनि ! तुमको दुःख का कारण कोई नहीं, तुम क्यों शोकवान् होते हो, तुमको कौन अनिष्ट प्राप्त हुआ है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! मुझको एक दुःख है, सो कहता हूँ । जो मित्र बूझे तो मन ही कहना चाहिए और दुःख भी नष्ट होता है जैसे मेघ जड़ और श्याम होता है और उसका स्वजन जो खेत और पृथ्वी हैं, उनके ऊपर वह वर्षा करता है तो उसकी जड़ता और श्यामता नष्ट होती है—इससे मैं तुमसे कहता हूँ । हे राजन् ! जबतक स्वर्ग में सभा स्थित थी, तबतक मैं नारद के पास

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1065, कुल 1734 में से · BharatKosha