योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1066, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * २५७
रहा । जब सभा उठी, तब नारदमुनि भी उठे और मुझसे कहा कि जहाँ तेरी इच्छा हो, वहाँ जा और मैं भी जाता हूँ । नारद एक ही जगह में नहीं ठहरते, विश्व में घूमते फिरते हैं । तब मैं आकाश को चला तो एक जगह सूर्य से मिलाप हुआ और में मेघमार्ग में तीव्र वेग से चला । जैसे नदी पर्वत से तीव्र वेग से आती है, वैसे ही में तीव्र वेग से चला आता था । मैंने देखा कि दुर्वासा ऋषीश्वर महामेघ की तरह श्यामवस्त्र पहिने हुए और भूषणसंयुक्त जैसे बिजली का चमत्कार होता है, वेगे उड़े आते हैं । भूषणों का चमत्कार देखकर मैंने दण्डवत् करके कहा, हे मुनीश्वर ! तुमने क्या रूप धरा है जो स्त्रियों का सा लगता है ?
दुर्वासा ने तब रुष्ट होकर मुझसे कहा, हे ब्रह्मा के पौत्र ! तू क्या कहता है ? ऐसा मुनीश्वर के प्रति कहना उचित नहीं । हम क्षेत्र हैं; जैसा बीज क्षेत्र में बोइये वैसा ही उगता है । तूने मुझे स्त्री कहा है, इससे तू भी स्त्री होगा और रात्रि को तेरे सब अंग स्त्री के हो जायँगे । हे मुनीश्वर ! जो कल्याणकृत ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनमें नम्रता होती है । जैसे फल-संयुक्त वृक्ष नम्र होता है, वैसे ही ज्ञानी भी नम्र होता है । ऐसे वचन तुझे न कहना चाहिए । हे राजन् ! यह सुनकर मैं तुम्हारे पास चला आया हूँ और मुझे लज्जा आती है कि स्त्री का शरीर रखकर देवताओं के साथ में कैसे विचरूँगा—यही मुझको सोच है । राजा ने कहा, क्या हुआ जो दुर्वासा ने कहा और स्त्री का शरीर हुआ । तुम तो शरीर नहीं, निर्लेप आत्मा हो । हे मुनीश्वर ! तुम अपनी समता में स्थित रहते हो । ज्ञानवान् पुरुष को हेय उपादेय कुछ नहीं रहता । वह तो अपनी समता में स्थित रहता है ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! तुम सत्य कहते हो । मुझे क्या दुःख है ? जो शरीर का प्रारब्ध है, सो होता है । यह ईश्वर का नियम है कि जब तक शरीर रहता है, तब तक शरीर के स्वभाव भी रहते हैं । शरीर का स्वभाव त्याग करना भी मूर्खता है । जिस स्थान में ज्ञान की प्राप्ति हो, उसी चेष्टा में विचरिये । इन्द्रियों को रोकना और मन में विषय की चिन्तना करना भी मूर्खता है । इन्द्रियों और देह की