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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1067, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1067

२५८ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

चेष्टा ज्ञानवान् भी करते हैं; परन्तु उसमें बँधते नहीं। इन्द्रियाँ विषय में वरतती हैं। ईश्वर का आदि नियम इसी प्रकार है।

हे राजन्! नियम या नीति का त्याग किसी में नहीं किया जाता-इससे उसका क्यों त्याग करिये। यह नीति है कि जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जैसे जब तक तिल है, तब तक तेल भी होता है; वैसे ही जब तक शरीर है, तब तक शरीर के स्वभाव भी होते हैं। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे देह और इन्द्रियों में चेष्टा भी करते हैं, परन्तु उसमें बँधते नहीं। पर अज्ञानी उसमें बँध जाते हैं। चेष्टा तो ज्ञानी भी करते हैं, अज्ञानी भी करते हैं। जैसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि जो ज्ञानवान् हैं, वे सब चेष्टाएँ करते हैं, परन्तु किसी में नहीं बँधते। हे राजन्! वैसे जो अनिच्छित आकार प्राप्त हो और जिसको शास्त्र प्रमाण करें, उसको भोगने में कुछ दोष नहीं। राजा बोले, हे भगवन्! ज्ञानवान् को दोष कुछ नहीं। जो सत्ता समान में स्थित है, उसे कुछ दोष नहीं होता। अज्ञानी शरीर के दुःख अपने में देखता है, उनमे दुःखी होता है और ज्ञानवान् शरीर के दुःख अपने में नहीं देखता। हे राम! इतने में सूर्य अस्त हुआ। तब राजा और कुम्भज दोनों ने सायंकाल में सन्ध्या करके जप किया। जब रात्रि हुई, तारागण निकले और सूर्यमुखी कमलों के मुख मूँद गये, तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! देखो, मेरे सिर के बाल बढ़ते जाते हैं, वस्त्र भी टखने तक हो गये हैं और स्तन भी स्त्री की नाईं हैं।

निदान चुड़ाला लक्ष्मी की नाईं महासुन्दर स्त्री हो गई। उसको देखकर राजा को एक मुहूर्त्त शोक रहा। उसके उपरान्त सावधान होकर बोला, हे मुनि! क्या हुआ जो तुम्हारा शरीर स्त्री का हुआ? तुम तो शरीर नहीं, आत्मा हो-इससे शोक क्यों करते हो? तुम अपनी सत्ता समान में स्थित रहो। जब रात्रि हुई तब रानी ने महासुन्दर रूप रचकर फूलों की शय्या बिछाई और उस पर दोनों इकट्ठे सोये। हे राम! समस्त रात्रि उनकी कोई वासना नहीं जागी। दोनों सत्ता समान में स्थित रहे और मुखमे कुछ न बोले। जब प्रातःकाल हुआ, तब फिर रानी