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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1068, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1068

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ २५६

ने कुम्भज का शरीर रखकर स्नान किया और गायत्री जप आदि कर्म किये । इसी प्रकार चुड़ाला रात्रि को स्त्री बन जाती और दिन को कुम्भज पुरुष का शरीर रखती । जब कुछ काल ऐसे बीता तब दोनों वहाँ से चलकर सुमेरु पर्वत के ऊपर गये और मन्दराचल और अस्ताचल पर्वत आदि सब सुख-दुःख के स्थानों को देखा । पर एक दृष्टि को लिये रहे । न किसी को हर्ष हुआ और न शोक, ज्यों के त्यों रहे । जैसे पवन से सुमेरु पर्वत चलायमान नहीं होता, वैसे ही शुभ-अशुभ स्थानों में वे समान रहे ।

इति श्रीयो० निर्वा० शिखिध्वजस्त्रीप्राप्तिर्नाम द्व्यशीतितमसर्गः ॥ ८२ ॥

इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार विचरते विचरते वे मन्दराचल की कन्दरा में पहुँचे तो वहाँ कुम्भजरूप चुड़ाला ने राजा से परीक्षा के निमित्त कहा, हे राजन् ! जब मैं रात्रि को स्त्री होती हूँ, तब मुझे भर्ता के भोगने की इच्छा होती है; क्योंकि ईश्वर का नियम ऐसा ही है कि स्त्री को अवश्यमेव पुरुष चाहिए । जो उत्तम कुल का पुरुष होता है उसको कन्या विवाह करके पिता देता है अथवा जिसको स्त्री चाहे उसको आप देख ले । इससे हे राजन् ! मुझे तुमसे अधिक कोई नहीं देख पड़ता । तुम मेरे भर्ता हो और मैं तुम्हारी स्त्री हूँ । तुम मुझे अपनी भार्या जानकर जो कुछ स्त्री-पुरुष चेष्टा करते हैं सो किया करो । मेरी अवस्था भी यौवन है और तुम भी सुन्दर हो । ज्ञानवान् अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग नहीं करते । यदि तुमको इच्छा न हो तो भी ईश्वर की नीति इसी प्रकार है । उसके उल्लंघन से क्या सिद्ध होगा ? जो अपनी स्वरूपसत्ता में स्थित है, उसको ग्रहण-त्याग की कुछ इच्छा नहीं, परन्तु जो नीति है वह करनी चाहिए । राजा बोला, हे साधु ! जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, मुझको तो तीनों जगत् आकाशरूप भासित होते हैं । मुझे प्राप्त होने में कुछ सुख नहीं और अप्राप्ति में दुःख नहीं और न कुछ हर्ष-शोक है । जो तुम्हारी इच्छा हो, सो करो ।

कुम्भज बोले, हे राजन् ! आज ही पूर्णमासी का भला दिन है और मैंने आगे में लग्न भी गिन रखा है, इससे मन्दराचल पर्वत की

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