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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1069, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1069

२६० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

कन्दरा में बैठकर विवाह करें। निदान राजा और कुम्भज दोनों उठे और जो कुछ सामग्री शास्त्र की रीति में थी, वे इकट्ठी कर दोनों ने गङ्गा में स्नान किया। वस्त्र, फूल, फल आदि जो विवाह की सामग्री है सो एकत्र की। कल्पवृक्ष से लेकर दोनों ने फल भोजन किये। सूर्य अस्त हुआ तो दोनों ने सन्ध्योपासन किया। कुम्भज ने राजा को दिव्य वस्त्र और भूषण पहिनाये और सिर पर मुकुट रक्खा। फिर कुम्भज ने अपना शरीर त्यागकर स्त्री का शरीर धारण किया और राजा से बोला, हे राजन्! अब तू मुझे भूषण पहिना। तब राजा ने सम्पूर्ण भूषण, फूल और वस्त्र उसे पहिनाये और वह पार्वती की नाईं सुन्दर बनी। तब चुडाला ने कहा, हे राजन्! में अब तेरी स्त्री हूँ और मेरा नाम मदनिका है। तुम मेरे भर्ता हो—मुझे तुम कामदेव से भी सुन्दर लगते हो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इसी प्रकार चुडाला ने बहुत कुछ कहा, तो भी राजा का चित्त हर्ष को न प्राप्त हुआ और वह विराग से शोकवान् भी न हुआ—ज्यों का त्यों रहा। इसके उपरान्त जब विवाह का आरम्भ हुआ तो चन्दन आदि सामग्री और सुवर्ण के कलश पास रखकर देवताओं का पूजन किया और जो शास्त्र की विधि थी, वह सम्पूर्ण करके मङ्गल किया। फिर रानी ने यह संकल्प किया कि सम्पूर्ण ज्ञाननिष्ठा तुम्हें दी और राजा ने संकल्प किया कि सम्पूर्ण ज्ञाननिष्ठा तुझे दी। जब रात्रि एक पहर रही, तब राजा और रानी ने फूलों की शय्या बिछाकर शयन किया और आपस में चर्चा ही करते रहे, सम्भोग कुछ न किया। प्रातःकाल कुम्भज ने स्त्री का शरीर त्यागकर कुम्भज का शरीर धरा और स्नान-संध्यादिक कर्म किये। हे राम! इसी प्रकार एक मास पर्यन्त मन्दराचल पर्वत में वे रहे। रात्रि को रानी स्त्री का शरीर रखती और दिन को कुम्भज का शरीर धरती। जब तीसरा दिन होता, तब राजा को शयन कराकर राज्य की सुध लेती और फिर आकर राजा के पास शयन करती।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विवाहलीलावर्णनं नाम त्र्यशीतितमस्सर्गः ॥ ८३ ॥