योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1070, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ निर्वाण प्रकरण ॐ २६१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब वहाँ से वे चले तो अस्ताचल पर्वत में जाकर रहे और उदयाचल, सुमेरु, कैलास इत्यादिक पर्वतों की कन्दराओं और वनों में रहे। कहीं एक मास, कहीं दस मास, कहीं पाँच दिन, कहीं सात दिन रहे। इसी तरह जब एक वन में आये, तब रानी ने विचार किया कि इतने स्थान राजा को दिखाये, तो भी इसका चित्त किसी में नहीं बँधा, इसमें अब और परीक्षा लूँ। ऐसे विचार-कर उसने अपनी ऐसी माया फैलाई कि तैंतीस कोटि देवता सहित इन्द्र के आगे किन्नर, गन्धर्व, सिद्ध और अपसरा नृत्य करती आईं। सर्वसामग्री संयुक्त इन्द्र को देखकर राजा उठा और बहुत प्रीति से उसकी पूजा करके बोला, हे त्रैलोक्य के पति ! तुम किस लिये वन में आये हो सो कहो ? इन्द्र ने कहा, हे राजन् ! जैसे पक्षी ऊपर आकाश में उड़ता है और उसकी पेटी में तागा होता है उससे उड़ता हुआ भी नीचे आता है, वैसे ही हम ऊर्ध्व के वासी तप और शुभ लक्षणों के तागेरूपी गुणों को श्रवण करके स्वर्ग से खिंचे चले आते हैं—इस प्रकार हमारा आना हुआ है। इससे हे राजन् ! तुम स्वर्ग को चलो और स्वर्ग में स्थित होकर दिव्य भोगों को भोगो। ऐरावत हाथी पर अथवा उच्चैःश्रवा घोड़ा, जो क्षीरसमुद्र के मथन से निकला है, उस पर सवार होकर चलो। अणिमा, महिमा, गरिमा आदि आठ सिद्धियाँ भी विद्यमान हैं। जो इच्छा हो, सो लो और स्वर्ग में चलो। हे राजन् ! तुम तत्त्ववेत्ता हो, तुमको ग्रहण या त्याग करना कुछ नहीं रहा। परन्तु जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसका त्याग करना योग्य नहीं—इससे स्वर्ग में चलो।
राजा बोले, हे देवराज ! जाना वहाँ होता है, जहाँ आगे न गया हो, और जहाँ आगे ही गये हो, वहाँ कैसे जावें ? हे देवराज ! हमको सब जगह स्वर्ग ही देख पड़ता है। जो वहाँ स्वर्ग हो और यहाँ न हो, तो जाना भी उचित है; परन्तु जहाँ हम बैठे हैं, वहीं हमें स्वर्ग भासित होता है; इससे हम कहाँ जावें ? हमको तीनों लोक स्वर्ग ही दीखते हैं और सदा स्वर्गरूप जो आत्मा है हम उसी में स्थित हैं। हमको सर्वत्र