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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1071, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1071

२६२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

स्वर्ग है, हम सदा तृप्त और आनन्दरूप हैं। इन्द्र बोले, हे राजन्! जो विदित-वेद्य पूर्णबोध हैं, वे भी यथाप्राप्त भोगों को सेवते हैं तो तुम क्यों नहीं सेवते? इन्द्र ने ऐसा जब कहा, तब राजा इतना कहकर चुप हो गया। फिर इन्द्र ने कहा—भला जो तुम नहीं आते तो हमही जाते हैं। तुम्हारा और कुम्भज का कल्याण हो। हे राम! ऐसा कहकर इन्द्र उठ खड़ा हुआ और चला, पर जब तक वह देख पड़ता था, तब तक देवता भी साथ दीखते थे, फिर जब दृष्टि से अगोचर हुए तब अन्तर्धान हो गये। जैसे समुद्र में तरङ्ग उठकर फिर लीन हो जाते हैं और जाना नहीं जाता कि कहाँ गये, वैसे ही इन्द्र अन्तर्धान हो गया। वह इन्द्र कुम्भजरूप चूडाला के सङ्कल्प से उठा था। जब सङ्कल्प लीन हुआ, तब अन्तर्धान हो गया। चूडाला ने देखा कि ऐसे ऐश्वर्य, सिद्धि और अप्सराओं के प्राप्त होने पर भी राजा का चित्त समता में रहा और किसी पदार्थ में नहीं बँधा।

इति श्री० नि० मायाशक्रागमनवर्णनं नाम चतुरशीतितमस्सर्गः ॥ ८४ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम! जब चूडाला इन्द्र का छल कर चुकी, तब विचारने लगी कि ऐसा चरित्र मैंने राजा को मोहने के निमित्त किया तो भी राजा किसी में नहीं बँधा और ज्यों का त्यों ही रहा। बड़ा कल्याण हुआ कि राजा सत्तासमान में स्थित रहा—इससे बड़ा आनन्द हुआ। अब और चरित्र करूँ, जिसमें इसको क्रोध और खेद दोनों हों। ऐसे विचारकर राजा की परीक्षा के निमित्त उसने यह चरित्र किया कि जब सायंकाल का समय हुआ, तब गङ्गा के किनारे राजा संध्या करने लगा और कुम्भज वन में रहा। उसने वहाँ सङ्कल्प का मन्दिर रचा। जैसी देवताओं की रचना होती है, वैसी ही मन्दिर के पास फूलों की एक बाड़ी लगाई और उसमें कल्पवृक्ष आदि नाना प्रकार के फूल-फल-संयुक्त वृक्ष रचे। फिर सङ्कल्प से शय्या रचकर एक सङ्कल्प का महासुन्दर पुरुष रचा और उसके साथ अङ्ग से अङ्ग लगा और गले में फूलों की माला डाल कामचेष्टा करने लगी। जब राजा सन्ध्या कर चुका तो रानी को देखने लगा, पर वह न देख पड़ी। निदान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते