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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1072, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1072

निर्वाण प्रकरण २६३

उस मन्दिर के निकट आया तो क्या देखा कि एक कामी पुरुष के साथ मदनिका सोई हुई है और दोनों कामचेष्टा करते हैं। तब राजा ने विचारा कि भले आराम से दोनों सो रहे हैं, इनके आनन्द में विघ्न क्यों कीजिये।

हे राम ! इस प्रकार राजा ने अपनी स्त्री को देखा तो भी शोकवान् न हुआ और क्रोध भी न किया, ज्यों का त्यों शान्तपद में स्थित रहा। मन्दिर के बाहर निकल के वहाँ एक सुवर्ण की शिला पड़ी थी उस पर आकर बैठा और आधे नेत्र मूँदकर समाधि में स्थित हुआ। दो घड़ी के उपरान्त मदनिका कामी पुरुष को त्यागकर बाहर आई और राजा के निकट आकर अङ्गों को नग्न किया और फिर वस्त्रों से ढका। जैसे और स्त्रियाँ काम से व्याकुल होती हैं, वैसे ही चुडाला को देखकर राजा ने कहा; हे मदनिका ! तू ऐसे सुख को त्यागकर क्यों आई है ? तू तो बड़े आनन्द में मग्न थी। अब वहीं फिर जा। मुझे तो हर्प या शोक कुछ नहीं। मैं ज्यों का त्यों हूँ। परन्तु तेरी और कामी पुरुष की प्रीति परस्पर देखी है । जगत् में परस्पर ऐसी प्रीति नहीं होती। इससे तू उसको सुख दे, वह तुझे सुख दे । तब मदनिका लज्जा से सिर को नीचे करके बोली, हे भगवन् ! क्षमा करो। मुझ पर क्रोध न करो। मुझसे बड़ी अवज्ञा हुई है, परन्तु मैंने जानकर नहीं की। सारा वृत्तान्त सुनो। जब तुम सन्ध्या करने लगे, तब मैं बन में आई तो वहाँ एक कामी पुरुष का मिलाप हुआ। मैं निर्बल थी और वह बली था। उसने पकड़कर मुझे गोद में बैठा लिया और जो कुछ इच्छा थी सो किया। मैंने जो पतिव्रता स्त्री की मर्यादा थी, उसके अनुसार उस पर क्रोध किया और उसका निरादर किया और पुकार भी की—ये तीनों पतिव्रता की मर्यादा हैं सो मैंने की—परन्तु तुम दूर थे और वह बली था, मुझसे उसने बलात्कार किया। हे भगवन् ! मुझमें कुछ दोष नहीं, इससे तुम क्षमा करके क्रोध न करो।

राजा बोले, हे मदनिका ! मुझे कभी क्रोध नहीं होता। आत्मा ही सर्वत्र दीखता है, तब क्रोध किस पर करूँ। मुझे न कुछ ग्रहण करना