योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है और न त्याग करना है, तथापि यह कर्म साधुओं में निन्दित है। इससे मैंने अब तेरा त्याग किया है। अब सुख से विचरूँगा। मेरा गुरु जो कुम्भज है, वह मेरे पास ही है। वह और मैं सदा बीतराग हैं। तू तो दुर्वासा के शाप से उपजी है। तुझसे मुझे क्या प्रयोजन है, तू अब ऊर्मी के पास जा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मायापिञ्जरवर्णनं नाम पञ्चाशीतितमस्सर्गः ॥ ८५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तब मदनिका नाम की चूडाला ने विचार किया कि बड़ा कार्य हुआ, जो राजा आत्मपद को प्राप्त हुआ। ऐसी सिद्धि और ऐश्वर्य दिखाये और कठिन क्रूर स्थान भी दिखाये, तो भी राजा शुभ-अशुभ में ज्यों का त्यों रहा। इससे बड़ा कल्याण हुआ कि राजा को शान्ति प्राप्त हुई और वह रागद्वेष से रहित हुआ। अब मैं इसे अपना चूडाला का पूर्वरूप दिखाऊँ और सम्पूर्ण वृत्तान्त जताऊँ। ऐसे विचार कर जब मदनिका शरीर से चूडालारूप में भूषण और वस्त्रसहित प्रकट हुई, तब राजा उसे देखकर महाआश्चर्य को प्राप्त हुआ और ध्यान में स्थित होकर देखा कि यह चूडाला कहाँ से आई है। फिर पूछा, हे देवि ! तू कहाँ से आई है ? तुझे देखकर तो मैं आश्चर्य को प्राप्त हुआ हूँ; क्योंकि ऐसी तो मेरी स्त्री चूडाला थी। तू यहाँ किस निमित्त आई है और कब की आई है ? चूडाला बोली, हे भगवन् ! मैं तुम्हारी स्त्री चूडाला ही हूँ और तुम मेरे स्वामी हो। हे राजन् ! कुम्भज से लेकर इस चूडाला शरीर तक सब चरित्र मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त किये हैं। तुम ध्यान में स्थित होकर देखो कि ये चरित्र किसने किये हैं ? मैंने अब पूर्व का चूडाला का शरीर रचा है। हे राम ! जब ऐसे चूडाला ने कहा, तब राजा ध्यान में स्थित होकर देखने लगा और एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहकर सब वृत्तान्त जान लिया। उसके उपरान्त राजा ने आश्चर्य को प्राप्त होकर नेत्र खोले और रानी को कण्ठ में लगा लिया। निदान दोनों ऐसे हर्ष को प्राप्त हुए जो सहस्र वर्ष पर्यन्त शेषनाग उस सुख को वर्णन करें तो भी न