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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1074, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1074

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २६५

कह सकेंगे। वे ऐसे सत्तासमान में स्थित होकर शान्ति को प्राप्त हुए, जिसमें क्षोभ कभी नहीं होता।

राजा और रानी दोनों कण्ठ लगकर मिले थे, इससे अङ्गों में उष्णता उपजी थी, इस कारण धीरे-धीरे उन्होंने अंग खोले। हर्षित होकर राजा की रोमावलि खड़ी हो आई और नेत्रों में आँसू बहने लगे। ऐसी अवस्था में राजा बोला, हे देवि! मुझ पर तुमने बड़ा अनुग्रह किया है। तुम्हारी स्तुति मैं नहीं कर सकता। जो कुछ संसार के पदार्थ हैं, वे सब मायामय और मिथ्या हैं। तुमने मुझे सत्पद को पहुँचाया है, इससे मैं तुम्हारी कहाँ तक प्रशंसा करूँ। हे देवि! मैंने अब जाना कि मैंने जो राज्य का त्याग किया, वह और इस चुड़ाला के शरीर पर्यन्त सब तुम्हारे ही चरित्र हैं। तुमने मेरे वास्ते बड़े कष्ट सहे और बड़े यत्न किये। आना और जाना, शरीर का स्वाँग भरना और उड़ना इत्यादि में तुमने बड़ा कष्ट पाया है और बड़े यत्न से मुझे संसार-समुद्र से पार करके बड़ा उपकार किया है। तुम धन्य हो। जितनी देवियाँ अरुन्धती, ब्रह्माणी, इन्द्राणी, पार्वती, सरस्वती और श्रेष्ठ कुल की कन्या और पतिव्रता हैं, उन सबमें तुम श्रेष्ठ हो। जिस पुरुष को पतिव्रता प्राप्त होती है, उसके सब कार्य सिद्ध होकर उसे बुद्धि, शान्ति, दया, शक्ति, कोमलता और मैत्री प्राप्त होती है। हे देवि! मैं तुम्हारे प्रसाद से शान्त-पद को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझे कोई क्षोभ नहीं है। ऐसा पद शास्त्रों और तप से भी नहीं मिलता।

चुड़ाला बोली, हे राजन्! तुम काहे को मेरी स्तुति करते हो? मैंने तो अपना कर्त्तव्य किया है। हे राजन्! तुम राज्य का त्याग कर बन में मोह अर्थात् अज्ञान को साथ ही लिये आये थे, इससे नीच स्थान में पड़े। जैसे कोई गङ्गाजल त्यागकर कीचड़ के जल को अङ्गीकार करे, वैसे ही तुमने आत्मज्ञान और अक्रियपद का त्यागकर तप को अङ्गीकार किया था। जब मैंने देखा कि तुम कीचड़ में गिरे हो तो मैंने तुम्हें निकालने के लिए इतने यत्न किये हैं। हे राजन्! मैंने अपना कर्त्तव्य किया है। राजा बोले, हे देवि! मेरा यही आशीर्वाद है कि