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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1075, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1075

२६६ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

जो कोई पतिव्रता स्त्री हों वे सब ऐसे कार्य करें, जैसे तुमने किये हैं। जो पतिव्रता स्त्री में कार्य होता है; वह और में नहीं होता। हे देवि! अरुन्धती आदि जितनी पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, उनमें तुम प्रथम गिनी जाओगी। मैं जानता हूँ कि ब्रह्माजी ने क्रोधकर तुम्हें इस निमित्त उपजाया है कि अरुन्धती आदि देवियों ने जो गर्व किया होगा, उस गर्व को मिटावें। इससे हे देवि! तुम धन्य हो। तुमने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया है। हे देवि! तुम मेरे अङ्ग में लगो। तुमने मेरा बड़ा उपकार किया है। हे राम! ऐसे कहकर राजा ने रानी को फिर कण्ठ से लगाया, जैसे नेवला और नेवली मिलें और मूर्ति की नाईं लिखे हों।

चूड़ाला बोली, हे भगवन्! एक तो मुझसे यह कहो कि ज्ञानरूप आत्मा के एक अंश में जगत लीन हो जाते हैं; ऐसे तुम हो। अपने को अब तुम क्या जानते हो? अब तुम कहाँ स्थित हो? राज्य तुम्हें कुछ दिखाई देता है या नहीं और अब तुम्हारी क्या इच्छा है? शिखिध्वज बोले, हे देवि! जो स्वरूप तुमने-ज्ञान से निश्चित किया है, वही मैं अपने को जानता हूँ और शान्तरूप हूँ। इच्छा-अनिच्छा मुझको कोई नहीं रही—केवल शान्तरूप हूँ। हे देवि! जिस पद की अपेक्षा करके ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र की मूर्तियाँ भी शोकसंयुक्त लगती हैं, उस पद को मैं प्राप्त हुआ हूँ, जहाँ कोई उत्थान नहीं; जो निष्किञ्चन है और जिसमें किञ्चिन्मात्र भी जगत नहीं। मैं जो था वही हुआ हूँ, इससे अधिक और क्या कहें। हे देवि! तुमने संसारसमुद्र से मुझे पार किया है, इससे तुम मेरी गुरु हो। ऐसे कहकर राजा चूड़ाला के चरणों पर गिर पड़ा और बोला—मुझे अज्ञान कभी स्पर्श नहीं करेगा। जैसे ताँबा पारस के संग में सुवर्ण होकर फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही मैं तुम्हारे प्रसाद से मोहरूपी कीचड़ से निकला हूँ और फिर कभी न गिरूँगा। अब मैं इस गत के सुख-दुःख से संतुष्ट हुआ। ज्यों का त्यों स्थित हूँ और राग-द्वेष को उठानेवाला मेरा चित्त नष्ट हो गया है। अब मैं प्रकाशरूप अपने आपमें स्थित हूँ। जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है और जल के नष्ट होने पर प्रतिबिम्ब भी सूर्यरूप होना