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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1076, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1076

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २६७

है, वैसे ही मेरा चित्त भी आत्मरूप हुआ है। अब मैं निर्वाणपद को प्राप्त हो सबसे अतीत हुआ हूँ और सबमें स्थित हूँ। जैसे आकाश सब पदार्थों में स्थित है और सब पदार्थों से अतीत है, वैसे ही मैं भी हूँ। मेरे 'अहं' 'त्वं' आदिक शब्द नष्ट हुए हैं और मैं शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ। अब मुझमें ऐसा-वैसा शब्द कोई नहीं। मैं अद्वैत और चिन्मात्र हूँ और न सूक्ष्म हूँ, न स्थूल हूँ।

चुड़ाला बोली, हे राजन्! जो तुम ऐसे स्थित हुए तो अब क्या करोगे और अब तुम्हें क्या इच्छा है? राजा बोले, हे देवि! न मुझे कुछ अङ्गीकार करने की इच्छा है और न त्याग करने की। जो कुछ तुम कहोगी सो करूँगा। तुम्हारे कहने को अङ्गीकार करूँगा। जैसे मणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, वैसे ही मैं तुम्हारे वचनों को ग्रहण करूँगा। चुड़ाला बोली, हे प्राणपति हृदय के प्रियतम राजा! अब तुम विष्णु हुए हो। यह बड़ा उत्तम हुआ कि तुम्हारी इच्छा नष्ट हुई है। हे राजन्! अब उचित है कि तुम और मैं मोह से रहित होकर अपने प्राकृत आचार में विचरें। हम अखेद जीवन्मुक्त होकर अपने प्राकृत आचार को क्यों त्यागें? हे राजन्! जो अपने आचार को त्यागेंगे तो और किसी को ग्रहण करेंगे। इससे अपने ही आचार में विचरते हैं और भोग-मोक्ष दोनों को भोगते हैं। हे राम! ऐसे परस्पर विचार करते दिन व्यतीत हुआ और सायंकाल की सन्ध्या राजा ने की। फिर शय्या का आरम्भ किया। उस पर दोनों सोये और रात्रिभर परस्पर चर्चा ही करते एकक्षण की नाईं रात्रि बिताई।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पददर्शितसन्मार्गः ॥ ८६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब ऐसे रात्रि बीती और सूर्य की किरणें फैलीं; सूर्यमुखी कमल खिल आये, तब राजा ने स्नान किया। चुड़ाला ने मन के संकल्प से रत्नों की मटकी रच हाथ में ली, उसमें गङ्गादिक सम्पूर्ण तीर्थों का जल डाला और राजा को स्नान कराके शुद्ध किया। तब राजा ने संध्यादिक सब कर्म किये। तब चुड़ाला ने कहा, हे राजन्! मोह का नाश करके सुखपूर्वक अपने राज-काज करने चाहिये