योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जिसमे सुख भोगें । राजा बोले, हे देवि ! जो तुम्हें सुख भोगने की इच्छा हो तो स्वर्ग में भी हमारा राज्य है और सिद्धलोक में भी हमारा राज्य है । इसमें स्वर्ग में विचरें ! चूडाला बोली, हे राजन ! हमको न सुख भोगने की इच्छा है, न त्यागने की इच्छा है । हम तो ज्यों के त्यों हैं । इच्छा और अनिच्छा तब होती है, जब आगे कुछ पदार्थ भासित होता है । पर हमको तो केवल आत्मा दीखता है; स्वर्ग कहाँ और नरक कहाँ—हम सर्वदा एकरस स्थित हैं । हे राजन ! यद्यपि हमको कुछ भेद नहीं, तो भी जब तक शरीर का प्रारब्ध है, तब तक शरीर रहता है, इससे चेष्टा भी होना चाहिए । और की चेष्टा करने में अपन प्राकृत आचार को क्यों न कीजिये, जिसमें रागद्वेष में रहित होकर अपने राज्य को भोगें ? इससे अब उठो और अष्टवसु के तेज को धारण कर राज्य करने को सावधान हो ।
राजा ने कहा बहुत अच्छा, और अष्टवसु के तेजसंयुक्त हो बोला, हे देवि ! तुम मेरी पटरानी हो और मैं तुम्हारा भर्ता हूँ, तो भी तुम और मैं एक ही हैं । राज्य तब होता है, जब सेना भी हो, इससे सेना भी रचो । तब उस चूडाला ने सम्पूर्ण सेना और हाथी, घोड़े, रथ, नौबत, नगारे, निशान इत्यादिक राज्य की सामग्री रची और सब प्रत्यक्ष आगे आकर स्थित हुई । नौबत, नगारे, तुरही और शहनाई बजने लगा और जो कुछ राज्य की सामग्री है; वे अपने अपने स्थान में स्थित हुई । राजा के सिर पर छत्र फिरने लगा और राजा और रानी हाथी पर सवार होकर मन्दराचल पर्वत के ऊपर चले । आगे पीछे सब सेना हुई । राजा ने जिस जिस जगह पर तप किया था सो रानी को दिखाता गया कि इस स्थान में मैं इतने काल रहा हूँ; इसमें इतना रहा हूँ । ऐसे दिखाते दिखाते बड़े वेग से चले । मन्त्री, पुरवासी और नगर-वासी राजा को लेने आये और बड़े आदर से नमन किया । इस प्रकार दोनों अपने मन्दिर पहुँचे । आठ दिन तक राजा से लोकपाल और मण्डलेश्वर मिलने को आते रहे । इसके उपरान्त राजसिंहासन पर बैठकर दोनों राज्य करने लगे । समदृष्टि को लिये दशसहस्र वर्ष तक