योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २६६
राज्य किया। फिर चुड़ाला संयुक्त जीवन्मुक्त होकर विचरे और दोनों विदेह मुक्त हुए। हे राम! दशसहस्र वर्ष पर्यन्त राजा और चुड़ाला ने राज्य किया और दोनों समसमान में स्थित रहे। किमी पदार्थ में वे रागवान् न हुए और किमी में द्वेष भी न किया ज्यों के त्यों शान्त-पद में स्थित रहे। जितनी राज्य की चेष्टा है, सो करते रहे, परन्तु भीतर से किसी में बँधे नहीं—केवल आत्मपद में अचल रहे। फिर राजा और चुड़ाला विदेह मुक्त हुए—जैसे अपने को जानते थे, उसी ज्ञान के बल से परमाकाश अक्षोभपद में जाकर स्थित हुए और जैसे तेल बिना दीपक निर्वाण होता है, वैसे ही प्रारब्धवेग का क्षय होने पर निर्वाणपद को प्राप्त हुए। हे राम! जैसे शिखिध्वज और चुड़ाला जीवन्मुक्त होकर भोगों को भोगते विचरे हैं, वैसे ही तुम भी रागद्वेष से रहित होकर विचरो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजचुड़ालाख्यान-समाप्तिर्नाम सप्तशीतितमस्सर्गः ॥ ८७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिखिध्वज का सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। ऐसी दृष्टि का आश्रय करो, जो पाप का नाश करती है। उस दृष्टि के आश्रय से जिस मार्ग के द्वारा शिखिध्वज तत्पद को प्राप्त हुआ और जीवन्मुक्त होकर राज्य-व्यवहार करता रहा, वैसे ही तुम भी तत्पद का आश्रय करो और उसी के परायण हो आत्मपद को पाकर भोग और मोक्ष दोनों भोगो। इसी प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच ने भी बोध पाया है। राम ने पूछा, हे भगवन्! जिस प्रकार बृहस्पति का पुत्र कच बोध को प्राप्त हुआ, सो भी संक्षेप में कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! कच बालक जब अज्ञान अवस्था को त्यागकर पद-पदार्थ को जानने लगा, तब उसने अपने पिता बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे पिता! इस संसार के पिंजरे में से में कैसे निकलूँ? जितना संसार है, वह जीवत्व से बँधा हुआ है। अनात्मदेहादिकों में मिथ्या अभिमान करने को जीवत्व कहते हैं। जिसमें 'अहं', 'त्वं' माना जाता है, उस संसार से कैसे मुक्त होऊँ? बृहस्पति बोले, हे तात! इस अनर्थरूप संसार में जीव