योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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तब मुक्त होता है, जब सबका त्याग करता है। सर्वत्याग किये बिना मुक्ति नहीं होती। इससे तू सर्वत्याग कर जिससे मुक्त हो। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार बृहस्पति ने कहा, तब कच ऐसे पावन वचनों को सुन ऐश्वर्य का त्याग कर वन को गया और एक कन्दरा में स्थित होकर तप करने लगा।
हे राम! बृहस्पति को कच के जाने से कुछ खेद न हुआ; क्योंकि ज्ञानवान पुरुष संयोग-वियोग में सम रहते हैं और हर्ष-शोक को कभी प्राप्त नहीं होते। जब आठ वर्ष पर्यन्त कच ने तप किया, तब बृहस्पति ने जाकर देखा कि वह एक कन्दरा में बैठा है। तब वह कच के पास आ गये। कच ने पिता का पूजन गुरु की भाँति किया। बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने गद्गदवाणी से प्रश्न किया-हे पिता! आठ वर्ष बीते मैंने सर्वत्याग किया है, तो भी शान्ति को नहीं प्राप्त हुआ? जिसमें मुझे शान्ति हो, सो कहो। बृहस्पति ने कहा हे तात! सर्वत्याग कर, जिससे तुझे शान्ति हो। ऐसे कहकर बृहस्पति उठ खड़े हुए और आकाश को चले गये। हे राम! जब बृहस्पति ऐसे कहकर चले गये, तब कच आसन और मृगछाला को त्याग कर और वन को चला और एक कन्दरा में जाकर स्थित हुआ। तीन वर्ष वहाँ व्यतीत हुए तो फिर बृहस्पति आये और देखा कि कच स्थित बैठा है। तब कच ने भली प्रकार गुरु की तरह उनका पूजन किया और बृहस्पति ने कच को गले लगाया। तब कच ने कहा, हे पिता! अब तक मुझे शान्ति नहीं हुई। मैंने सर्वत्याग भी किया; क्योंकि अपने पास कुछ नहीं रखता। इससे जिसमें मेरा कल्याण हो, वही कहो। बृहस्पति ने कहा, हे तात! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; सब के कारण चित्त का जब त्याग करेगा, तब सर्वत्याग होगा; इससे चित्त का त्याग कर।
वशिष्ठजी बोले, हे राम! ऐसे कहकर जब बृहस्पति आकाश को चले गये, तब कच विचारने लगा कि पिता ने सर्वपद चित्त को कहा है, वह चित्त क्या है? प्रथम वन के पदार्थों को देखकर विचारने लगा