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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1080, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1080

निर्वाण प्रकरण२७१


कि यह चित्त है। फिर देखा कि ये भिन्न-भिन्न हैं, इसमें ये चित्त नहीं और नेत्र भी चित्त नहीं; क्योंकि नेत्र श्रवण नहीं। और श्रवण नेत्रों से भिन्न है। श्रवण भी चित्त नहीं इसी प्रकार सब इन्द्रियाँ चित्त नहीं; क्योंकि एक में दूसरे का अभाव है। फिर चित्त क्या है, जिसको जान कर त्याग करूँ? फिर विचार किया कि पिता के पास स्वर्ग में जाऊँ। हे राम! ऐसे विचारकर कच उठ खड़ा हुआ और दिगम्बर होकर आकाश को चला। जब पिता के पास पहुँचा, तब पिता का पूजन करके बोला, हे तैंतीस कोटि देवताओं के गुरु! चित्त का रूप क्या है? उसका रूप कहिये, जिससे मैं उसका त्याग करूँ। बृहस्पति बोले, हे पुत्र! चित्त अहंकार का नाम है। वह अज्ञान से उपजा है और आत्मज्ञान से इसका नाश होता है। जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प दिखता है और रस्सी के जानने से सर्पभ्रम नष्ट हो जाता है। इससे अहंभाव का त्याग कर और स्वरूप में स्थित हो। कच बोले, हे पिता! अहंभाव का त्याग कैसे करूँ? 'अहं', तो मैं ही हूँ, फिर अपना त्याग करके स्थित कैसे होऊँ? इसका त्याग करना तो महाकठिन है।

बृहस्पति बोले, हे तात! अहंकार का त्याग करना तो महासुगम है। फूल के मलने में और नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, परन्तु अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे पुत्र! अहंकार कुछ वस्तु नहीं; भ्रम से उत्पन्न है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में बेताल की कल्पना करता है, रस्सी में सर्प दिखता है; मरुस्थल में जल की कल्पना होती है और आकाश में भ्रम से दो चन्द्रमा दीखते हैं, वैसे ही परिच्छिन्न अहंकार अपने प्रमाद से उपजा है। आत्मा शुद्ध आकाश से भी निर्मल है और देश-काल-वस्तु के परिच्छेद से रहित सत्ता सामान्य चिन्मात्र है। उसमें स्थित हो, जो तेरा स्वरूप है। तू आत्मा है। तुझमें अहंकार कभी नहीं है। हे साधु! आत्मा सर्वदा, सब प्रकार सबमें स्थित है। उसमें अहंभाव किंचित् भी नहीं है। जैसे समुद्र में धूल कभी नहीं होती, वैसे ही आत्मा में अहंकार कभी नहीं है। आत्मा में न एकत्व है, और न द्वैत। वह केवल अपने आपमें स्थित है। और जो