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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1081, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1081

२७२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

नाना आकार देख पड़ते हैं, वे चित्त के स्फुरण में हैं। चित्त के नष्ट होने पर आत्मा ही शेष रहता है। इससे अपने स्वरूप में स्थित हो जिससे तेरा दुःख नष्ट हो जावे। जो कुछ यह देख पड़ता है, इसमें भी आत्मा है। जैसे पत्र, फूल, फल सब बीज से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही सब आत्मा का चमत्कार है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिसंबोधन- नामाष्टाशीतितमस्सर्गः ॥ ८८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार बृहस्पति ने उत्तम उपदेश किया तब कच उसे सुनकर स्वरूप में स्थित हुआ और जीवन्मुक्त होकर विचरा। हे राम ! जैसे कच जीवन्मुक्त होकर विचरा और निरहंकार हुआ, वैसे ही तुम भी निष्काम होकर विचरो और केवल अद्वैतपद को प्राप्त हो, जो निर्मल और शुद्ध है। जिसमें अद्वैत या द्वैत कुछ नहीं, तुम उसी पद में स्थित हो। तुममें दुःख कोई नहीं। तुम आत्मा हो और तुममें अहंकार नहीं। तुम ग्रहण या त्याग किसका करोगे। जो पदार्थ ही ही नहीं तो ग्रहण या त्याग किसका हो ? हे राम ! जैसे आकाश में फूल नहीं तो उसका ग्रहण क्या और त्याग क्या, वैसे ही आत्मा में अहंकार नहीं। जो ज्ञानवान पुरुष है, वे अहंकार का ग्रहण और त्याग नहीं करते। मूर्ख को एक आत्मा में नाना आकार दीखते हैं, इससे किसी का शोक करता है और कहीं हर्ष करता है। तुम कस दुःख