योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २७३
उस वर्षा से मैं अघा गया हूँ। अब मैं शान्तपद को प्राप्त हुआ हूँ। मेरे तीनों ताप मिट गये हैं और कोई वासना मुझ में नहीं रही। तुम्हारे अमृतरूपी वचनों को सुनकर मेरा जी नहीं भरता। जैसे चकोर चन्द्रमा को देखकर किरणों से तृप्त नहीं होता, वैसे ही तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं तृप्त नहीं होता। इससे एक प्रश्न करता हूँ, उसका उत्तर कृपा करके दीजिये। हे भगवन् ! मिथ्या क्या है और सत् क्या है, जिसकी रक्षा करते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस पर एक आख्यान है सो कहता हूँ, जिसके सुनने से हँसी आवेगी। आकाश में एक शून्य वन है और उसमें एक मूर्ख बालक है, जो आप मिथ्या है और सत्य के रखने की इच्छा करता है कि मैं इसकी रक्षा करूँगा। अधिष्ठान जो सत्य है, उसको वह नहीं जानता। मूर्खता करके दुःख पाता है और जानता है कि यह आकाश है; मैं भी आकाश हूँ; मेरा आकाश है; और मैं आकाश की रक्षा करूँगा। ऐसे विचारकर उसने एक दृढ़ गृह इस अभिप्राय से बनाया कि इसके द्वारा आकाश की रक्षा करूँगा।
हे राम ! ऐसे विचार करके उसने गृह की बहुत बनावट की। वह जो किसी जगह से टूटता-फूटता तो वह उसे फिर बना लेता। जब कुछ काल इस प्रकार बीता तो वह गृह गिर पड़ा। तब वह रुदन करने लगा कि हाय मेरा आकाश नष्ट हो गया। जैसे एक ऋतु व्यतीत हो और दूसरी आवे वैसे ही काल पाकर जब वह गृह गिर गया तो उसके उपरान्त उसने कुआँ बनाया और कहने लगा कि यह न गिरेगा; क्योंकि मैं इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा। हे राम ! इस प्रकार कुएँ को बनाकर उसने सुख माना। जब कुछ काल बीता तो जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिरता है, वैसे ही वह कुआँ भी गिर पड़ा। तब वह बड़े शोक को प्राप्त हुआ कि मेरा आकाश गिर पड़ा और नष्ट हो गया, अब मैं क्या करूँगा ? ऐसे शोक से जब कुछ काल बीता, तब उसने एक खाई बनाई—जैसे अनाज रखने के लिए बनाते हैं—और कहने लगा कि अब मेरा आकाश कहाँ जावेगा ? मैं अब इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा। ऐसी खाई बनाकर उसने बहुत सुख माना और अति-