योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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- योगवासिष्ठ *
प्रसन्न हुआ । पर जब कुछ काल पाकर वह खाई भी टूट पड़ी-क्योंकि उपजी वस्तु का विनाश होना अवश्य है-तो फिर वह रुदन करने लगा कि मेरा आकाश नष्ट हो गया । जब कुछ काल शोक में बीता, तब उसने एक घट बनाया और घटाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल में वह घट भी जब नष्ट हो गया, तब उसने एक कुण्ड बनाया और कुण्डाकाश की रक्षा करने लगा । कुछ काल के उपरान्त कुण्ड भी नष्ट हो गया, तब शोकवान् हो उसने एक हवेली बनाई और कहने लगा कि अब मेरा आकाश कहाँ जावेगा में अब इसकी भली प्रकार रक्षा करूँगा । ऐसा विचारकर वह बड़े हर्ष को प्राप्त हुआ । पर जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब वह हवेली भी गिर पड़ी । तब वह दुःख को प्राप्त हो कहने लगा कि हाय ! हाय ! मेरा आकाश नष्ट हो गया और मुझे बड़ा कष्ट हुआ है । हे राम ! आत्मा और आकाश के ज्ञान बिना वह मूर्ख बालक इसी प्रकार दुःख पाता रहा । जो अपने यथार्थ रूप को जानता और आकाश को भी ज्यों का त्यों जानता तो यह कष्ट काहे को पाता ?
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषाकाशरक्षाकरणं नामैकोननवतितमस्सर्गः ॥ ८९ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वह मिथ्यापुरुष कौन था; जिसकी रक्षा करता था, वह आकाश क्या था; और जो गृह, कूप आदिक बनाता था सो क्या थे; यह प्रकट करके कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मिथ्यापुरुष तो अहंकार है, जो संवेदन के चेतने से उपजा है । आकाश चिदाकाश है, उसे वह उपजा जानता है कि में आकाश की रक्षा करूँ । और गृह, घटादिक जो कहे सो विविध देह हैं । उनमें आत्मा अधिष्ठान है, उस आत्मा की रक्षा करने की इच्छा वह मूर्खता से करता है और अपने को नहीं जानता कि मेरा स्वरूप क्या है । उस अपने स्वरूप को न जानने से वह दुःख पाता है । आप मिथ्या है और मिथ्या होकर आकाश को कल्पित कर रखने की इच्छा करता है अर्थात देह में देही के रखने की इच्छा करता है कि वह जीता रहे । पर देह तो काल