योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण *
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से उपजा है। फिर देह के नष्ट होने से शोकवान् होता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता, जिसका नाश कदापि नहीं होता। ऐसे विचार से रहित होकर जीव क्लेश पाता है। हे राम ! जिसमें भ्रम उपजा है, वह अधिष्ठान असत् नहीं होता। सबका अपना आप आत्मा है। उसका भी नाश नहीं होता। उसमें मूर्खता से अहंकारादि संसार की जीव कल्पना करता है। अहंकार, मन, जीव, बुद्धि, चित्त, माया प्रकृति और दृश्य आदि सब इसके नाम हैं। पर मिथ्या हैं। इसका अत्यन्त अभाव है। यह न होता ही उदय हुआ है और क्षत्रिय, ब्राह्मण इत्यादि वर्ण और गृहस्थादि आश्रम, मनुष्य, देवता, दैत्य इत्यादि की कल्पना करता है।
हे राम ! यह कभी हुआ ही नहीं, न होगा और न किसी काल में किसी को है। यह केवल अविचार से सिद्ध है, और विचार किये से नहीं रहता। जैसे रस्सी के अज्ञान से जीव सर्प की कल्पना करता है और जानने से अज्ञान नष्ट हो जाता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से अहंकार उदय हुआ है। तुम्हारा स्वरूप आत्मा है, जो प्रकाशरूप, निर्मल, विद्या-अविद्या के कार्यों से रहित, चैतन्यमात्र और निर्विकल्प है। वह ज्यों का त्यों स्थित है, अद्वैत है। परिणाम को कभी नहीं प्राप्त होता। आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संसार और अहंकार कैसे हो ? सम्यक्-दर्शी को आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता और असम्यक्दर्शी को संसार भासित होता है। वह पदार्थों को सत् जानता है, संसार को वास्तव जानता है और अपने वास्तव स्वरूप को नहीं जानता कि मैं कौन हूँ, जिसके जानने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जितनी कुछ आपदा है, जिनकी खान अहंकार है। सब ताप अहंकार से ही उत्पन्न होते हैं। इसके नष्ट होने पर जीव अपने स्वरूप में स्थित होता है। यह विश्व भी आत्मा का चमत्कार है—भिन्न नहीं। जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के तरङ्ग और सुवर्ण में नाना प्रकार के भूषण जो भासित होते हैं, सो वही सागर और सुवर्ण हैं, उनसे भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से विश्व भिन्न नहीं। सुवर्ण परिणाम से भूषण और समुद्र