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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1085, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1085

२७६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

परिणाम में तरङ्ग होता है। पर आत्मा अच्युत है और परिणाम को नहीं प्राप्त होता। इससे वह समुद्र और सुवर्ण से भी विलक्षण है।

आत्मा में संवेदन से चमत्कारमात्र विश्व भी आत्मस्वरूप है। वह न कभी जन्मता है, न मृत्यु को प्राप्त होता है; न किसी काल में और न किसी के हाथ से वह मरता है, ज्यों का त्यों स्थित है। जन्ममृत्यु तो तब हो जब दूसरा हो, आत्मा तो अद्वैत है। जिसको एक नहीं कह सकते तो दूसरा कहाँ से हो? इससे प्रत्यक् आत्मा अपना अनुभवरूप है। उसमें स्थित हो, जिसमें सब दुःख और ताप नष्ट हो जावें। वह आत्मा शुद्ध और निराकार है। हे राम! जो निराकार और शुद्ध है, उसे किसमें ग्रहण कीजिये, कैसे रक्षा करिये और किसकी सामर्थ्य है कि उसकी रक्षा करे। जैसे घट के नष्ट होने पर घटाकाश नहीं नष्ट होता, वैसे ही देह के नष्ट होने पर देही आत्मा का नाश नहीं होता। आत्म-सत्ता ज्यों की त्यों है और जन्ममरण पुर्यष्टका से भासित होते हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब मृतक दीखता है और जब पुर्यष्टका से युक्त होता है, तब जीवित दीख पड़ता है। आत्मा सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसका ग्रहण कैसे हो और रक्षा कैसे करिये? स्थूल तो उपदेश के निमित्त कहते हैं। आत्मा तो अनिर्वचनीय और भाव अभावरूप संसार से रहित है। वह सबका अनुभवरूप है। उसमें स्थित होकर अहंकार का त्याग करो और अपने स्वरूप प्रत्यक् आत्मा में स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मिथ्यापुरुषोपाख्यान-समाप्तिर्नाम नवतितमस्सर्गः ॥६०॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार आत्मरूप है। जैसे इसकी उत्पत्ति हुई है, सो सुनो। निर्विकल्प शुद्ध आत्मा में चेतन लक्षण मनरूप में स्थित हुआ है और आगे उसने जगत् की कल्पना की है। जैसे समुद्र में तरङ्ग, सुवर्ण में भूषण, रज्जू में सर्प और सूर्य की किरणों में जल का आभास होता है, वैसे ही आत्मा का विवर्त मन है; पर वह आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जिसको तरङ्ग का ज्ञान है, उसको समुद्र