योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1086, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻ <span style="float:right;">२७७</span>
बुद्धि नहीं होती, वह तरङ्ग को और जानता है; जिसको भूषण का ज्ञान है, वह सुवर्ण नहीं जानता; सर्प के ज्ञान से रज्जू को नहीं जानता, वैसे ही नाना प्रकार के विश्व के ज्ञान से जीव परमात्मा को नहीं जानता। जैसे जिस पुरुष ने समुद्र को जाना है कि जल है, उमको तरङ्ग और बुलबुले भी जल ही भासित होते हैं, जल से भिन्न कुछ नहीं भासित होता; और जिसको रज्जी का ज्ञान हुआ है, उसको सर्पबुद्धि नहीं होती; जिसको सुवर्ण का ज्ञान हुआ है, उसको भूषण-बुद्धि नहीं होती; और जिसको किरणों का ज्ञान हुआ है, उसको जलबुद्धि नहीं होती—ऐसा पुरुष निर्विकल्प है, वैसे ही जिस पुरुष को निर्विकल्प आत्मा का ज्ञान हुआ है, उमको संसार की भावना नहीं होती—ब्रह्म ही भासित होता है। ऐसा जो मुनीश्वर है, वह ज्ञानवान् है।
हे राम ! मन भी आत्मा से भिन्न नहीं। आदि में परमात्मा से 'अहं' 'त्वं' आदिक मन प्रकट हुआ, उममें जो अहंभाव हुआ, वह उत्थान है। बहिर्मुख होने से जीव को अपने निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मस्वरूप का प्रमाद हुआ है और उम प्रमाद से आगे विश्व हुआ है। वास्तव में मन भी कभी उदय नहीं हुआ; आत्मस्वरूप होने के कारण उदय हुए की तरह भासित होता है। मन और संसार सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो दूसरी वस्तु हो तो सत् अथवा असत् कहिये, पर आत्मा तो अद्वैत ज्यों का त्यों स्थित है और उसका विवर्त मन होकर स्फुरित हुआ है। वही मन कीट है, और वही ब्रह्मा है। फिर ब्रह्मा ने मनोराज्य से स्थावर-जङ्गम सृष्टि रची है। वह सृष्टि न सत्य है और न असत्य। हे राम ! सब प्रपञ्च मन ने रचा है और उसी ने नाना प्रकार के विचार भी रचे हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, जीव आदि सब मन के ही नाम हैं। जब मन नष्ट हो जावे, तब न संसार है और न कोई विकार। यदि मन दृश्य से मिलकर कहे कि में संसार का अन्त लूँ तो कदाचित् अन्त न पावेगा क्योंकि संसरण ( जन्म-मरण ) ही संसार है, तो फिर मंसरण-संयुक्त संसार का अन्त कहाँ ? अन्त लेनेवाला वाणी से आगे उठकर देखता है। जैसे कोई