योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1087, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ योगवाशिष्ठ
पुरुष दौड़ता जाय और कहे कि मैं अपनी परछाहीं का अन्त लूँ कि कहाँ तक जाती है, तो हे राम! जब तक वह पुरुष चला जायगा, तब तक परछाहीं का अन्त नहीं होगा और जब ठहर जायगा, तब परछाहीं का अन्त हो जायगा, वैसे ही जब तक वासना है, तब तक संसार का अन्त नहीं होता और जब वासना नष्ट हो जाती है, तब संसार का भी अन्त होता है और आत्मा ही दृष्टिगोचर होता है और संसार का अत्यन्त अभाव हो जाता है। पर जो स्फूर्ति-संयुक्त देखेगा, तो संसार ही भासित होगा।
हे राम! जिस पदार्थ को मन देखता है, वह पदार्थ पहले कोई नहीं, चित्त के चेतने से उदय होता है। जब चित्त चेता कि यह पदार्थ है, तब आगे पदार्थ हुआ। चित्त यदि स्फूर्ति या वासना से रहित होकर देखे तो कोई पदार्थ नहीं भासित होता, केवल शान्तपद है। हे राम! तुम अहंकार का त्याग करके, इस नाना प्रकार की कल्पना से रहित निर्विकल्प ब्रह्मपद में स्थित हो। अहंकार नामरूपात्मक है और देह तथा वर्णाश्रम में माया से कल्पित है। जब अहंकार से रहित होकर देखोगे, तब केवल सचिदानन्द आत्म-पद शेष रहेगा। और जब उस पद को अपना रूप जानोगे, तब तुमही सर्वात्मा होकर विचरोगे और तुमको कोई दुःख न रहेगा। हे राम! मन ही संसार है। ब्रह्मा से कीट पर्यन्त सब मन की ही रचना है। मन ही सुमेरु है और मन ही तृण है। मन ही विश्वरूप होकर स्थित हुआ है। वह मन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे फल ही में समूचा वृक्ष होता है, वैसे ही मन आत्मस्वरूप है; आत्मा से भिन्न मन कुछ वस्तु नहीं। ऐसे जानकर आत्मस्वरूप होओगे। यह जो बन्धन और मोक्ष संज्ञा है, इनका त्याग करो, न बन्धन की वाञ्छा करो और न मोक्ष की इच्छा करो। इस कल्पना से रहित हो; ऐसे न सोचो कि तुम मुक्त हो और यह बन्धन है, केवल सत्तासमान आत्मपद में स्थित होओ। वही भावना करो, जिससे तुम्हारा सब दुःख नष्ट हो जाय। ऐसा जो पुरुष हो जाता है, उसका चित्तभाव नहीं रहता। उसको