योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1088, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण *
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सर्वत्रआत्मा देख पड़ता है । जैसे जिस पुरुष ने सूर्य को जाना है, उसको किरणें भी सूर्य ही दीखती हैं, वैसे ही जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है, उसको जगत् भी आत्मस्वरूप देख पड़ता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे परमार्थयोगोपदेशो- नामैकनवतितमसर्गः ॥ ९१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी होकर रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य धारण कर स्थित होओ । राम ने पूछा, हे भगवन् ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं, सो कृपा करके कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम्हारे प्रश्न पर एक आख्यान है, सो सुनिये । एक समय सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा के शिखर में सदाशिवजी आये । वह चन्द्रमा को मस्तक में धारण किये थे । गणों सहित गौरी बायें अङ्ग में उनके साथ थीं । तब भृङ्गीगण ने, जो महातेजस्वी था और जिसे आत्म-जिज्ञासा उपजी थी, हाथ जोड़कर प्रश्न किया कि हे भगवन् ! देवों के देव ! यह संसार मिथ्या भ्रम है; इसमें में सत्य पदार्थ कोई नहीं देखता । यह सदा चलरूप भासित होता है । जो सत् पदार्थ है, उसको मैं नहीं जानता । मेरे ताप नष्ट नहीं हुए और मैं शान्त नहीं हुआ, इसमें अपने को दुःखी देखता हूँ । जिससे शान्ति हो सो कृपा करके कहो, जिसमें खेद से रहित होकर मैं चेष्टा में विचरूँ । पर खेद से रहित तो तब होता है, जब कोई आश्रय होता है । संसार तो मिथ्या है, मैं किसका आश्रय करूँ ? इससे मुझसे यह कहिये कि किसका आश्रय करने से मेरे दुःख नष्ट होंगे ?
ईश्वर बोले, हे भृङ्गिन् ! तुम महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी हो रहो और सब शङ्काओं को त्यागकर निरन्तर धैर्य का आश्रय करो; इससे तुम्हारे दुःख नष्ट होंगे । हे राम ! भृङ्गीगण ने, जिसको शिवजी ने पुत्र करके रखा है, यह सुनकर प्रश्न किया कि हे परम-ेश्वर ! महाकर्ता, महाभोक्ता और महात्यागी किसे कहते हैं; सो कृपा करके मुझसे कहिये ? ईश्वर बोले, हे पुत्र ! सर्वात्मा, जो अनुभवरूप