योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1089, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० * योगवासिष्ठ *
है, उसका आश्रय करके विचरो। तब दुःख से रहित होगे। इन तीनों वृत्तियों में तुम्हारे दुःख नष्ट हो जायेंगे। जो कुछ शुभ क्रिया आकर प्राप्त हो, उसकी शङ्का त्याग कर जो करे, वह पुरुष महाकर्ता है। धर्म-अधर्म क्रिया जो अनिच्छित प्राप्त हो, उसको रागद्वेष से रहित होकर जो करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुरुष मौनी, निरहंकार, निर्मल और मत्सर से रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जो अनिच्छित प्राप्त हुए का त्याग न करे और जो नहीं प्राप्त हुआ उसकी वाञ्छा न करे वह पुरुष महाकर्ता है। जो पुण्य-पाप क्रियाएँ अनिच्छित प्राप्त हों उनको अहंकार से रहित होकर करे, पुण्यक्रिया करने से अपने को पुण्यवान् न माने और पाप करने में पापी न माने; सदा अपने को अकर्ता जाने, वह पुरुष महाकर्ता है जो सर्वत्र विगतस्नेह है, सत्यवत् स्थित है और इच्छा को त्यागकर बरतता है, वह महाकर्ता है। जो दुःख के प्राप्त होने पर शोक नहीं करता और सुख के प्राप्त होने पर जिसे हर्ष नहीं होता, स्वाभाविक चित्त समता को देखता है, वह कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता। सुख की भिन्न-भिन्न विषमताओं में जो रहित है, वह पुरुष महाकर्ता है। जिस पुरुष ने सुख-दुःख का त्याग किया है वह पुरुष महाकर्ता है।
हे बुद्धिन्! जो पुरुष प्राप्त हुई वस्तु को रागद्वेष से रहित होकर भोगता है, वह महाभोक्ता है। जो बड़ा कष्ट प्राप्त होने पर भी द्वेष नहीं करता और बड़े सुख की प्राप्ति में जिसे हर्ष नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो बड़े राज्य के सुख भोगने में अपने को सुखी नहीं मानता, राज्य के अभाव में और भिक्षा माँगने में अपने को दुःखी नहीं मानता, सदा स्वरूप में स्थिर रहता है, वह महाभोक्ता है। जो मान, अहंकार और चिन्तना से रहित केवल समता में स्थित है, वह महाभोक्ता है। जो कोई कुछ दे तो अपने को लेनेवाला नहीं मानता और शुभ क्रिया में भोगता हुआ अपने में कर्तृत्व और भोक्तृत्व नहीं मानता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो मीठा, खट्टा, कषाय, तीक्ष्ण, सलोना, कटु, इन छहों रसों के भोगने में समचित्त रहता है और सम जानता है, वह महाभोक्ता