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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1090, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1090

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २८१

है। जिसे रसवाले पदार्थ प्राप्त होने पर हर्ष नहीं होता और विरस के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, और जैसा बुरा-भला प्राप्त हो उसको दुःख से रहित होकर भोगता है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ-अशुभ, भाव-अभाव क्रियाएँ हैं, उनके सुख-दुःख से जो चलायमान नहीं होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जिसको मृत्यु का भय नहीं और जीने की आस्था नहीं, जो उदय-अस्त में समान है, वह महाभोक्ता है। जिसे बड़े सुख की प्राप्ति में हर्ष नहीं होता और दुःख की प्राप्ति में शोक नहीं होता, ज्यों का त्यों रहता है, वह महाभोक्ता है। जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो उसको करता हुआ अहंकार से रहित है, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो पुरुष शत्रु, मित्र और सुहृद् में समबुद्धि रखता है और विषमता को कभी नहीं प्राप्त होता, वह पुरुष महाभोक्ता है। जो कुछ शुभ, अशुभ, दुःख सुख प्राप्त हो, उसको जो धारण कर लेता है, कभी विषमता को नहीं प्राप्त होता—जैसे समुद्र में नदियाँ प्राप्त होती हैं और वह उनको धारण कर सम रहता है—वह ज्ञानवान् शुभ-अशुभ को ग्रहण कर सम रहता है।

जो संसार, देह, इन्द्रियाँ और अहंकार की सत्ता त्यागकर स्थित हुआ है और जानता है कि 'न मैं देह हूँ,' 'न मेरी देह,' मैं इनका साक्षी हूँ, ऐसी वृत्ति को धारण करनेवाला महात्यागी है। जो सब चेष्टा करता है और रागद्वेष से रहित है, वह महात्यागी है। जो प्राप्त हुए शुभ-अशुभ को अहंकार से रहित होकर करता है, वह महात्यागी है। जो मन, इन्द्रिय और देह की भी इच्छा से रहित है, वह सब चेष्टाएँ करने पर भी महात्यागी है। जो पुरुष समचित्त, इन्द्रियजित और क्षमावान् है, वह महात्यागी है। हे राम! जिस पुरुष ने धर्म-अधर्म की देह और संसार के मद, मान, मनन इत्यादिक कल्पना का त्याग किया है, वह महात्यागी है। हे राम! इस प्रकार सदाशिव ने—जो हाथ में खप्पर लिये, बाघम्बर ओढ़े और चन्द्रमा मस्तक में धारे हुए परम प्रकाशरूप हैं—भृङ्गीगण को उपदेश किया। जैसे भृङ्गीगण