योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
विचरो, वैसे ही तुम भी विचरो तो तुम्हारे सब दुःख नष्ट होंगे । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाकर्ताद्युपदेशो नाम द्विनवतितमसर्गः ॥ ९२ ॥
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आपने जो उपदेश किया, वह मैं समझ गया । आपने पहले उपशम प्रकरण में उपदेश किया था कि आत्मा अनन्त और शुद्ध है । तब मैंने प्रश्न किया था कि जो आत्मा अनन्त और शुद्ध है तो यह कल्पना कैसे उपजी है—जैसे समुद्र निर्मल है उसमें धूल कैसे हो—तब आपने प्रतिज्ञा की थी कि इस प्रश्न का उत्तर सिद्धान्त-काल में कहेंगे । सो में अब सिद्धान्त का पात्र हूँ मुझसे कहिये । जैसे स्त्री भर्त्ता से प्रश्न करती है और भर्त्ता कृपा करके उपदेश करता है, वैसे ही में आपकी शरण हूँ । कृपा करके मुझे उत्तर दीजिये; क्योंकि आशा और तृष्णा के फाँसे मेरे टूटे हैं और आशारूपी जाल से मैं निकल गया हूँ । मेरे हृदय में संशयरूपी धूल उठ रही है । उसको वचनरूपी वर्षा से शान्त करो । मेरे हृदय में अन्धकार है, उसे वचनरूपी क्रीड़ा से निवृत्त करो । आपके वचनरूपी अमृत से में तृप्त नहीं होता । हे भगवन् ! गुरु के उपदेश किये बिना अपने विचार ज्ञान में नहीं शोभते । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष शान्त, क्षमावान् और इन्द्रियजित है, जिसने मन के संकल्प-विकल्प को जीता है, वह सिद्धान्त का पात्र है । हे राम ! तुम अब सिद्धान्त के पात्र हो, इससे उपदेश करता हूँ ।
जो पुरुष राग-द्वेष सहित क्रिया में स्थित है और जिसकी इन्द्रियों के सुख से आसक्ति है, वह सिद्धान्त के वाक्य "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वंब्रह्म" को सुनकर भोगों में स्थित होता है और अधोगति पाता है, क्योंकि उसको निश्चय नहीं होता और उसका हृदय मलिन है । इससे इन्द्रियों के सुख से वह अपने को सुखी मानता है और नीच स्थानों को प्राप्त होता है । जो पुरुष क्षमा आदिक साधनों से पवित्र हुआ है, उसको "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वं ब्रह्म" के सुनने से शीघ्र ही भावना में आत्मपद की प्राप्ति होती है । तुम जैसे पुरुष, जो क्षमा आदि साधनों से पवित्र हुए हैं, उनको स्वरूप की प्राप्ति सुगम होती है । और जिनका