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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1092, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1092

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

अन्तःकरण मलिन है, उनको वह बहुत कठिन है। जैसे भुने बीज को पृथ्वी में बोइये तो उसका अंकुर नहीं उगता, वैसे ही इन्द्रियारामी पुरुष को आत्मा की प्राप्ति नहीं होती। तुम सरीखे जिनका हृदय शुद्ध है, उनको ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे ही इन वचनों को पाकर सोहते हैं। जैसे वर्षाकाल में धान पृथ्वी में वर्षा से शोभा पाते हैं, वैसे ही सिद्धान्त के वचनों को पाकर व ज्ञानरूपी दीपक मे प्रकाशित होते हैं। जिन्हें ज्ञानवान् पुरुष ऊँची बाँह करके कहते हैं और सब शास्त्र भी कहते हैं, उन सब शास्त्रों के सिद्धान्तों को और उनके दृष्टान्तों को मैं जानता हूँ। इससे सब सिद्धान्तों का सार कहता हूँ, तुम सुनो। तब अपने स्वरूप को जानोगे।

हे राम! जिसको अभ्यास से एक क्षण भी अपने रूप का साक्षात्कार हुआ है, वह फिर गर्भ में नहीं आता। उसको सत्-असत् में कुछ भेद नहीं होता। संवेदन में भेद होता है। जैसे जाग्रत् और स्वप्न के सूर्य के दोनों प्रकाश समान हैं; जाग्रत् में जाग्रत् सूर्य का प्रकाश अर्थाकार होता है और स्वप्न में स्वप्न का सूर्य अर्थाकार होता है, पर प्रकाश दोनों का सम और संवित् भिन्न है। मनुष्य स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत् जानता है तो संवेदन में भेद हुआ, स्वरूप से भेद कुछ न हुआ। जैसे मन में एक बड़ा पर्वत रचिये तो संकल्प से दीखता है और एक पर्वत बाहर प्रत्यक्ष दीखता है तो संवित् का भेद हुआ; स्वरूप दोनों का तुल्य है। जैसे समुद्र में तरङ्ग है तो स्वरूप से जल और तरङ्गों का भेद कुछ नहीं, पर जिसको जल का ज्ञान नहीं, वह जल से अलग तरङ्ग ही जानता है, इससे संवित् में भेद है। वैसे ही स्वरूप में सत्-असत् तुल्य हैं। वास्तव में कुछ भेद नहीं। केवल शान्तरूप आत्मा है। शब्द का अर्थ संवेदन में है। शब्द अर्थात् नाम और अर्थ याने नामी संवेदन (स्फुरण) से है। जब संवेदन नष्ट हो जायगा, तब सब अर्थ भी आत्मा ही भासित होगा। जगत् की सत्ता तब तक है, जब तक आत्मा का प्रमाद है, और प्रमाद तब तक है, जब तक अहंभाव है। जब अहंभाव नष्ट होगा, तब केवल