सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1093, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1093

२८४ ❇ योगवाशिष्ट ❇

आत्मा शेष रहेगा । आत्मा शुद्ध, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित और कभी अविद्या या माया को स्पर्श नहीं करता । हे राम ! अविद्या की दो शक्तियाँ हैं; एक आवरण और दूसरी विक्षेप । आत्मा के न जानने का नाम आवरण है, और कुछ जानने को विक्षेप कहते हैं । वह आत्मा सदा ज्ञानरूप है, उसको आवरण कभी नहीं होता । वह अद्वैत है, उसमें कुछ भिन्न नहीं बना-इसी से वह शुद्ध, केवल और ज्ञानमात्र है । हे राम ! वह आत्ममात्र और चिन्मात्र है । उसमें अहं का उत्थान नहीं, केवल निर्वाणपद है । वहाँ एक और द्वैत कहना भी नहीं है । वह केवल अपने आपमें स्थित है । उसमें कल्पनारूपी धूल कहाँ से हो ?

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो सब ब्रह्म है तो मन, बुद्धि आदिक क्या हैं, जिनमें आप यह शास्त्र का उपदेश करते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! व्यवहार के अर्थ शब्द हैं; परमार्थ में कोई कल्पना नहीं । ये मन, बुद्धि आदिक कुछ वस्तु नहीं; ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है । जैसे तरङ्ग जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, वैसे ही मन आदि हैं । आत्मतत्त्व नित्य, शुद्ध और सन्मात्र है; नाहं की नाईं स्थित है । हे राम ! ऐसे आत्मा में संसार, अविद्या आदिक नाम कैसे हों ? आत्मा ब्रह्म है, उसमें भिन्न कुछ नहीं । वह सबका अधिष्ठान, अविनाशी और देशकाल-वस्तु के परिच्छेद से रहित है । इसी से ब्रह्म है । हे राम ! ऐसा जो अपना आप आत्मा है, उसी में स्थित होओ । यह जगत् जो देख पड़ता है, वह चिदाकाश है, भिन्न नहीं । जैसे स्वप्न में जो विश्व दीखता है, सो अनुभवमात्र है; वैसे ही यह जाग्रत विश्व भी आत्मरूप है । ऐसा जो तुम्हारा शुद्ध, नित्य उदित और अविनाशिरूप है, उसमें जब स्थित होगे, तब कल्पना जो तुमको भासित होती है वह नष्ट हो जायगी ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कल्पनानिषेधो नाम त्रिनवतितमसर्गः ॥ ६३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! संसार का बीज अहंकार है । जब अहं-भाव होता है, तब संसार होता है । पर अहंकार वस्तु कुछ नहीं, भ्रम