योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1094, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸
२८५
मे सिद्ध हुआ है। जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में पिशाच की कल्पना करता है; पर पिशाच कुछ वस्तु नहीं, उसके भ्रम से होता है, वैसे ही अहंकार कुछ वस्तु नहीं, स्वरूप के भ्रम से होता है। हे राम! जो वास्तव में कुछ वस्तु नहीं तो उसके त्यागने में क्या कठिनाई है? तुममें अहंकार वास्तव में नहीं है, तुम केवल शान्तरूप चैतन्यमात्र हो। उसमें अहंभाव होना उपाधि है। उससे सुमेरु पर्वत आदि जगत बन जाता है, जो संवेदनरूप है। चित्तरूपी पुरुष चैतन्य के आश्रय से चेतता है और विश्व की कल्पना करता है। जैसे रस्सी के आश्रय सर्प दीखता है, वैसे ही चैतन्य के आश्रय विश्व और चित्त का उदय होता है। पर ये आत्मा से भिन्न नहीं। 'मैं हूँ' ऐसा जो अहंभाव है, सो दुःख की खान है। सब आपदाएँ अहंकार से होती हैं। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सब दुःख भी नष्ट होंगे। हे राम! जैसे सूर्य के आगे बादल होते हैं तो प्रकाश नहीं होता। जब बादल दूर होते हैं, तब प्रकाश भासित होता है और कमल प्रफुल्लित होते हैं। वैसे ही आत्मरूपी सूर्य को अहंकाररूपी बादल का आवरण हुआ है। माया के किसी गुण में मिलकर अपने को कुछ मानने को अहंकार कहते हैं। जब अहंकार रूपी बादल नष्ट होगा, तब आत्मरूपी सूर्य का प्रकाश होगा, और ज्ञानवानरूपी कमल उस प्रकाश को पाकर बड़े आनन्द को प्राप्त होंगे।
हे राम! इसमें अहंकार के नाश का उपाय करो तो तुम्हारे दुःख नष्ट हो जावें। वह कौन काम है, जो उपाय करने से सिद्ध नहीं होता? अहंकार के नाश का उपाय करिये तो वह भी नष्ट हो जाता है। अहंकार के नष्ट करने का यह सरल उपाय है कि मन शास्त्रों अर्थात् ब्रह्मविद्या का सतत अभ्यास और सत्संग करे। ज्ञान की परस्पर चर्चा करने से अहंकार नष्ट हो जाता है। जैसे पानी भरने की रस्सी से पत्थर की शिला घिस जाती है, वैसे ही ब्रह्मविद्या के अभ्यास से अहंकार नष्ट होता है। बल्कि शिला के घिसने में तो कुछ यत्न भी है, पर अहंकार के त्यागने में कुछ यत्न नहीं। हे राम! सदा अनुभवरूप जो आत्मा है, उसका विचार करो में कौन हूँ? इन्द्रियाँ क्या हैं?