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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1095, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1095

२८६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गुण क्या है और संसार क्या है ? ऐसे विचार से समझो कि तुम इनके साक्षीभूत हो, तुममें 'अहं'-त्व कोई नहीं। इससे तुम अहंकार का नाश करो और शुद्ध हो। मेरा भी आशीर्वाद है कि तुम सुखी हो जाओ। जब अहंकार नष्ट होगा, तब कल्पना कोई न फुरेगी, केवल सुषुप्ति की नाईं स्थित होगे। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो आपका अहंकार नष्ट हुआ है तो प्रत्यक्ष उपदेश करते कैसे दिखते हो और जो अहंकार नहीं है तो सर्वशास्त्र और ब्रह्मविद्या कहाँ से उपजे हैं और उपदेश कैसे होता है ? उपदेश में तो चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। प्रथम जब उपदेश करने की इच्छा होती है, तब अहंकार सिद्ध होता है। तब स्मरण होता है कि उपदेश करूँ, तब चित्त भी चैत्य से सिद्ध होता है। फिर यह उपदेश करिये, यह न करिये, ऐसे संकल्प से मन की सिद्धि होती है। फिर जब निश्चय किया कि यह उपदेश करिये, तब बुद्धि की सिद्धि होती है। इससे चारों अन्तःकरण सिद्ध होते हैं। आप कैसे कहते हैं कि अहंकार नष्ट हो जाता है और सब चेष्टाएँ होती हैं ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मस्वरूप में अहंकार आदि अन्तःकरण और इन्द्रियाँ कल्पित हैं, वास्तव में कुछ नहीं। शास्त्र का उपदेश भी कल्पना है। आत्मा केवल आत्मतत्त्वमात्र है। उसमें संवेदन करके अहं-कार आदिक दृश्य उपजे हैं। उनके निवृत्त करने को वृत्त होते हैं। जैसे रज्जू में भ्रम से सर्प दिखता है तो उसके भय से आदमी दुःख पाता है, पर जब कोई कहे कि यह सर्प नहीं, रज्जू है, तू भय मत कर; इसको भली प्रकार देख, तो उसके उपदेश से वह भली प्रकार देखता है; तब उसका भय और शोक निवृत्त हो जाता है, क्योंकि इसको भ्रम से सर्प का भान हुआ था। वह भान भी मिथ्या है और उसकी रज्जू का उपदेश करना भी मिथ्या है; क्योंकि रज्जू तो आगे से सिद्ध है, उपदेश से सिद्ध नहीं होता । ऐसे ही रज्जू की भाँति आत्मा है ! उसका विक्षेप जो चेतनरूप स्फुरण है, उसको अहंभाव कहते हैं, और उसी अहंकार के निवृत्त करने को शास्त्र है। आत्मरूपी रज्जू के अज्ञान से अहंकाररूपी सर्प प्रकट हुआ है और उसके निवृत्त करने को