योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1096, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❉ निर्वाण प्रकरण ❉ २८७
शास्त्र के उपदेश हुए हैं, जो आत्मा को जगा देते हैं । जब भली प्रकार- रश्मी की तरह- आत्मा को जाना, तब सर्प के सदृश जो परिच्छिन्न अहंकार है, वह नष्ट हो जाता है । जैसे नेत्र का मल जब अञ्जन के लगाने में नष्ट हो जाता है, तब नेत्र ज्यों के त्यों निर्मल होते हैं, वैसे ही अज्ञानरूपी मैल गुरु और शास्त्र के उपदेशरूपी सुरमे से नष्ट हो जाता है । वास्तव में न कोई अहंकार है और न शास्त्र है; क्योंकि आत्मा सर्वदा सब समय उदयरूप है । परन्तु तो भी गुरु और शास्त्र से जाना जाता है ।
हे राम ! ज्ञानवान् के साथ चारों अन्तःकरण और इन्द्रियाँ भी देख पड़ती हैं, पर उनमें सत्यता नहीं होती । जैसे भुना हुआ बीज दिखाई देता है, पर उगने की सत्यता नहीं रखता, जैसे जला वस्त्र देखनेमात्र को है, पर उसमें सत्यता कुछ नहीं होती; वैसे ही ज्ञानवान को अभि- लाषारूप अहंकार नहीं होता और उससे वह कष्ट नहीं पाता । जैसे सूर्य की किरणों से मरुस्थल में जलाभास होता है और उसको देखकर पीने के लिए मृग दौड़ता और दुःखी होता है, वैसे ही दृश्यरूपी मरुस्थल में पदार्थरूपी जलाभास को देखकर अज्ञानरूपी मृग दौड़ते हैं और दुःख पाते हैं । जब ज्ञानरूपी वर्षा से आत्मरूपी जल चढ़ा, तब चित्तरूपी मृग कहाँ दौड़े ? जब ज्ञानरूपी वर्षा होती है और अनुभवरूपी जल चढ़ता है, तब चित्तरूपी मृग में यहरूपी जो स्फुरण था, वह नष्ट हो जाता है । हे राम ! अहंकार अविचार से सिद्ध है और विचार से क्षीण हो जाता है । जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों से क्षीण होती है और जब अधिक तेज होता है तब जलरूप हो जाती है, बर्फ की संज्ञा नहीं रहती, वैसे ही अहंकाररूपी बर्फ विचाररूपी किरणों से क्षीण हो जाती है । जब दृढ़ विचार होता है, तब अहंकार-संज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल आत्मा ही रहती है । राम ने पूछा; हे सर्वतत्त्वज्ञ भगवन् ! जिनका अहंकार नष्ट होता है, उनका लक्षण क्या है, सो कहिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अज्ञानरूपी गढ़ा संसार है, उसमें पदार्थ की सत् भावना से वह नहीं गिरता, जिसका अहंकार नष्ट हो जाता है । जैसे समुद्र में नदियाँ स्वाभाविक रूप से आकर मिलती हैं, वैसे ही