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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1097, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1097

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# * योगवाशिष्ठ *

उसको क्षमा, शान्ति आदिक शुभगुण स्वाभाविकरूप से प्राप्त होते हैं। उसका क्रोध भी नष्ट हो जाता है और देखनेमात्र यदि भासता भी है तो अर्थकार नहीं होता; विषमता करके भिन्न भावना हृदय में नहीं स्फुरती और केवल सत्तासमान में स्थित होता है। जैसे शरदकाल का मेघ गर्जता है; पर वर्षा से रहित होता है वैसे ही इन्द्रियों की चेष्टा वह अभिमान से रहित होकर करता है। जैसे वर्षाऋतु के जाने से कुदिग नहीं रहता, वैसे ही उसकी अभिमान चेष्टा नष्ट हो जाती है और लोभ भी मन से जाता रहता है। जैसे वन में अग्नि लगती है तो मृग और पक्षी उस वन को त्याग जाते हैं, वैसे ही लोभरूपी मृग उसको त्याग जाते हैं और उसके मन में कोई कामना नहीं रहती। जैसे दिन में उल्लूक और पिशाच नहीं विचरते, वैसे ही जहाँ ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है वहाँ सम्पूर्ण कामनारूपी तम नष्ट हो जाता है और शान्तरूप आत्मा में स्थित रहता है। जैसे मजदूर दो पोटों को ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में उठाता है और गर्मी से थकता है तो उसको डालके वृक्ष के नीचे सुख में स्थित होता है, वैसे ही वासनारूपी पोट है और अज्ञानरूपी धूप है उसमें दुःखी होता है; पर ज्ञानरूपी यत्न करके वासनारूपी पोट को डाल कर सुख में स्थित होता है।

हे रामजी! उस पुरुष की भोगवासना नष्ट हो जाती है और फिर उसे दुःख नहीं देती। जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागता है और फिर निकट नहीं आता, वैसे ही ज्ञानरूपी गरुड़ को देखकर भोगरूपी सर्प भागते हैं और फिर निकट नहीं आते। आत्मपद को पाकर ज्ञानी शान्तिरूपी दीपकवत् प्रकाशवान् होता है और भाव-अभाव पदार्थ उसको स्पर्श नहीं करते और संसारभ्रम निवृत्त हो जाता है। ज्ञान समझनेमात्र है, कुछ यत्न नहीं। सन्तों के पास जाकर प्रश्न करना कि मैं कौन हूँ? जगत् क्या है? परमात्मा क्या है? भोग क्या है? और इनसे मुक्त होकर कैसे परमपद को प्राप्त होऊँ। फिर जो ज्ञानवान् उपदेश करे, उसके अभ्यास से आत्मपद को प्राप्त होगा, अन्यथा न होगा।

इति श्री० नि० सन्तलक्षण माहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥४४॥