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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1098, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1098

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २८६

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिस प्रकार तुम्हारे पूर्वज इक्ष्वाकुनामक बड़े राजा जीवन्मुक्त होकर विचरे हैं, वैसे ही तुम भी विचरोगे; क्योंकि तुम भी उसी कुल में उपजे हो। हे राम! वह सब राजाओं में श्रेष्ठ सूर्यवंशी इक्ष्वाकु राजा मनु का पुत्र और सूर्य का पौत्र था। जैसे पितरों का राजा धर्म है। उसका स्वभाव शीतल था। जैसे सूर्य को देखकर मणि में तेज प्रकट होता है, वैसे ही उसको देखकर शत्रु संतप्त होते थे। पर साधु, मित्र और प्रजा को वह रमणीय लगता था और वे सब उसको देखकर शान्ति पाते थे। जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमुखी कुमुद प्रसन्न होते हैं, वैसे ही उसको देखकर सब प्रसन्न होते थे। वह पापरूपी वृक्षों का काटनेवाला कुल्हाड़ा और मित्रों को सुखदायक था—जैसे मोरों को मेघ सुखदायक होता है। सुन्दर वह ऐसा था कि उसको देख-कर उसके पास लक्ष्मी स्थिर हो रही थी। उसके यश से सम्पूर्ण पृथ्वी भर रही थी। वह राजा भली प्रकार प्रजा का पालन करता था। एक समय उसके मन में विचार उपजा कि संसार में जग, मरण आदि बड़े कष्ट हैं। इस संसार-दुःख के तरने का क्या उपाय है।

ऐसे वह विचार रहा था कि इतने में शम्भु मुनि ब्रह्मलोक से आये। उसने उनका भली प्रकार पूजन करके पूछा, हे भगवन्! आपकी कृपा का प्रताप मेरे हृदय में बैठकर प्रश्न करने को प्रेरित करता है, इससे मैं प्रश्न करता हूँ। हे भगवन्! मेरे हृदय में संसार बलता है और जैसे समुद्र को बड़वाग्नि जलाती है, वैसे ही मुझको जलाता है। इससे आप वही उपाय कहिये, जिससे मुझको शान्ति हो। हे भगवन्! यह संसार कहाँ से उपजा; दृश्य का स्वरूप क्या है और वह कैसे निवृत्त होता है? जैसे जाल से पक्षी निकल जाता है, वैसे ही जन्म, मरणरूप संसार महाजाल से मैं निकलना चाहता हूँ। जैसे वरुण समुद्र के सब स्थान जानता है, वैसे ही तुम जगत् के सब व्यवहारों को जानते हो और संशय के निवृत्त करनेवाले हो। अज्ञानरूपी तम के नाशकर्ता तुम सूर्य हो; तुम्हारे अमृतरूपी वचनों से मैं शान्ति को प्राप्त हूँगा। मुनि बोले हे साधो! मैं चिरकाल पर्यन्त जगत् में विचरता रहा हूँ, परन्तु ऐसा प्रश्न

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