योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० * योगवाशिष्ठ *
मुझसे किसी ने नहीं किया । तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है ? यह प्रश्न अनर्थ का नाश करनेवाला है । तेरी बुद्धि विवेक में विकासमान हुई देख पडती है । हे राजन् ! जो कुछ जगत तुमको भासित होता है, सो सब असत है । जैसे रस्सी में सर्प, स्वप्न में गन्धर्वनगर, मरुस्थल में जल, सीपी में रूपा, आकाश में नीलापन और दूसरा चन्द्रमा भ्रम में दिखते हैं, वैसे ही यह जगत असतरूप है; जैसे जल में चक्र और तरङ्ग असतरूप हैं, वैसे ही जगत असतरूप है । जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है और शून्य भी नहीं, सो मन और अविनाशी आत्मा कहलाता है । वह निर्मल परब्रह्म सर्व ओर से पूर्ण और अनन्त है, उसी में जगत कल्पित है ।
हे राजन् ! जैसे सब वृक्षों में एक ही रस व्यापक है, वैसे ही सब पदार्थों में एक चिन्मात्रसत्ता व्यापक है । जैसे अचल समुद्र में द्रवता से तरंग उठते हैं, वैसे ही परमात्मा में जगत प्रकट होते हैं । उस महादर्पण में सब वस्तुएँ प्रतिबिम्बित होती हैं । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले, चक्रादिक होते हैं; वैसे ही आत्मा में जीवादिक का आभास होता है । प्रथम स्फुरणरूप होते हैं और पीछे कारणकार्यरूप होते हैं । चित्तशक्ति अपने संकल्प से भूतादिक देह रचती है, उसमें स्वरूप के प्रमाद से आत्मा अभिमान करता है । जैसे कुमवारी की क्रिया अपने बन्धन का कारण होती है, वैसे ही जीव को अपना संकल्प बन्धन का कारण होता है । हे राजन् ! जीवकला को स्वरूप का अज्ञान हुआ है । इससे जैसे बालक को अपनी परछाईं यक्षरूप होकर डराती है, वैसे ही यह नाना प्रकार के आरम्भ को प्राप्त हुआ है, और अकारण ही ब्रह्मशक्ति फुरने से कारणभाव को प्राप्त हुआ है । उसमें बन्धन और मोक्ष भासित होते हैं । पर वास्तव में न बन्धन है और न मोक्ष है । निरामय ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है । उसमें एक और अनेक कुछ नहीं कह सकते । इससे बन्धन-मोक्ष की कल्पना को त्यागकर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्रीयो० नि० इक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥९५॥