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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1100, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1100

* निर्वाण प्रकरण * २६१

मुनि बोले, हे राजन्! जैसे द्रवता से जल ही तरंगभाव को प्राप्त होता है, तैसे ही चिन्मात्र ही संकल्प के स्फुरण से जीव होता है। और वह जीव संसार में कर्मों के वश भ्रमता हुआ भी अपने को कर्ता देखता है। पर सर्वात्मा परब्रह्म करता हुआ कुछ नहीं करता। जैसे सूर्य के प्रकाश से सब चेष्टाएँ होती हैं, पर सूर्य अकर्ता है, तैसे ही आत्मा की शक्ति से जगत् चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक पत्थर के निकट लोहा चेष्टा करता है, तैसे ही आत्मा की चेतनता से सब देहादिक चेष्टा करते हैं। पर आत्मा सदा अकर्ता है। जैसे जल में तरंग उठते हैं, तैसे ही आत्मा में देहादिक प्रकट होते हैं। जैसे सुवर्ण में भूषणों की कल्पना होती है, तैसे ही आत्मा में मोह से सुख-दुःख कल्पित होते हैं, पर आत्मा में कुछ कल्पना नहीं। शुद्ध आत्मा में मूढ़ों ने सुख-दुःख की कल्पना की है। पर जो ज्ञानवान् हैं, उनको मन, चित्त, सुख-दुःख सब आकाशरूप शून्य हैं। वे देह से रहित केवल चिदाकाशभाव को नहीं प्राप्त होते हैं। वे जरा-मरण को नहीं प्राप्त होते और सब कार्य करते देख पड़ते हैं, पर हृदय से सदा अकर्तारूप हैं। जैसे जल और दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब पड़ता है, परन्तु उसे स्पर्श नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् को क्रिया नहीं स्पर्श करती। शरीर के व्यवहार में भी वह सदा निर्मल है।

हे राजन्! आत्मा स्थिररूप है, परन्तु भ्रम से चञ्चल भासित होता है। जैसे जल की चञ्चलता से पर्वत का प्रतिबिम्ब भी चञ्चल होता है, तैसे ही देहादिक से आत्मा चलता भासित होता है। पर आत्मा नित्य शुद्ध और अपने आपमें स्थित है। जैसे घट के नाश से मिट्टी का नाश नहीं होता, तैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे शुद्ध मणि में नाना प्रकार के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, पर उनमें वह रञ्जित नहीं होती, तैसे ही आत्मा में मन, इन्द्रियाँ और देह दिखते हैं, पर उसे स्पर्श नहीं करते। जैसे सब मिष्ट पदार्थों में एक ही मिठाई व्यापी है तैसे ही सब पदार्थों में एक आत्मसत्ता व्यापी है। हे राजन्! आत्मा सदा अचलरूप है। परन्तु अज्ञान से चलरूप भासित होता है। जैसे दौड़ते हुए बालक को सूर्य दौड़ता लगता है, तैसे