योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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आत्मा देह संग में अज्ञानवश विकारवान भासित होता है । जैसे प्रतिबिम्ब का विकार आदर्श को नहीं स्पर्श करता, वैसे ही देह का विकार आत्मा को नहीं स्पर्श करता । जैसे अग्नि में सुवर्ण डालिये तो मैल जल जाता है, पर सुवर्ण का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश में आत्मा का नाश नहीं होता । वह तो नित्य शुद्ध, अवाच्य और अचिन्त्यरूप है ।
हे राजन् ! वह देखने में नहीं आता, परन्तु चेतनवृत्ति से सब देखता है । जैसे राहु अदृष्ट है, परन्तु चन्द्रमा के संयोग से दिखता है, वैसे ही आत्मा अदृष्ट है, परन्तु चेतनवृत्ति से जाना जाता है । जैसे शुद्ध दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही निर्मल बुद्धि से आत्मा का साक्षात्कार होता है । वह संकल्प से रहित अपने आपमें स्थित है ! जब बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने में आप उसको पाती है । हे राजन् ! जब तक अपनी बुद्धि निर्मल न हो, तब तक शास्त्र और गुरु से ईश्वर नहीं मिलता । जब अपनी बुद्धि निर्मल होती है, तब अपने आप वह दिखता है । जब संसार की सत्यता हृदय से दूर हो और आत्मा का अभ्यास हो तब बुद्धि निर्मल होती है । हे राजन् ! सब भाव-अभावरूप जो देहादिक पदार्थ हैं, वे असत् और केवल भ्रममात्र हैं । उनकी आस्था का त्याग करो । जैसे कोई मार्ग में चलता है तो अनेक पदार्थ मिलते हैं, परन्तु उनमें वह कुछ रागद्वेष नहीं करता, वैसे ही देह और इन्द्रियों के स्नेह से रहित आत्मतत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें देहादिक इन्द्रजाल की तरह मिथ्या है । उनकी भावना दूर से त्यागकर नित्य आत्मा में स्थित होओ ।
हे राजन् ! जीव आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु भी है, क्योंकि आत्मा में ओर का सद्भाव नहीं-आत्मा में आत्मा का ही भाव है-द्वैत नहीं । जो दृश्य पदार्थ और अनात्मधर्म विषय से खींचकर चित्त को अपने रूप में स्थित करता है, वह अपना मित्र है । और जो अनात्मधर्म में पदार्थों की ओर चित्त लगाता है, वह अपना शत्रु है । वास्तव में जो कुछ दृश्य प्रपंच है, वह भी आत्मरूप है । आत्मा में